गुरुवार, 13 जुलाई 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 27)

🌹  मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे।

🔴 घरों की गन्दगी लोग अक्सर गली या सड़क पर डाल देते हैं, उससे रास्ता निकलने वालों को असुविधा है और सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता अस्त-व्यस्त होती है। उचित यही है कि घरों में कूड़ेदान रखें और जब सफाई कर्मचारी आए, तब उसे उठवा दें। अशोभनीय अस्वच्छता से उस गली में रहने वाले तथा निकलने वालों को कष्ट न पहुँचाएँ। सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता और व्यवस्था नष्ट करना यह बताता है कि इन घिनौने व्यक्तियों को मनुष्यता के आरंभिक कर्तव्य नागरिकता तक का ही ज्ञान नहीं है।

🔵 मुसाफिरखाने, धर्मशाला, पाक्र, नदी-किनारे सिनेमाघर आदि सबके काम में आने वाले स्थानों में लोग जहाँ-तहाँ रद्दी कागज, दोने, पत्ते, सिगरेट के खोखे, मूँगफली के छिलके आदि पटकते रहते हैं और देखते-देखते ये स्थान गंदगी से भर जाते हैं। रेलगाड़ियों के डिब्बे में जहाँ हर आदमी को घिचपिच बैठना पड़ता है, ऐसी गंदगी बहुत अखरती है। संडासों में मलमूत्र का विसर्जन गलत स्थानों पर करने से वहाँ की स्थिति ऐसी हो जाती है कि दूसरों को उसका उपयोग करना कठिन पड़ता है। जबकि कितने ही मुसाफिर खड़े चल रहे हैं, तब कुछ लोग बिस्तर बिछाए, टाँग लम्बी किए लेटे रहते हैं और उठाने पर झगड़ते हैं।

🔴 इन लोगों को मनुष्यता की आरंभिक शिक्षा सीखनी ही चाहिए कि सार्वजनिक उपयोग के स्थान या वस्तुओं का उतना ही उपयोग करें जितना कि अपना हक है। सामान्य डिब्बे बैठने भर के लिए हैं। खाली हो तो कोई लेट भी सकता है, पर जबकि अनेक मुसाफिर खड़े या लटकते चल रहे हैं और चंद लोग लेटने को ऐसा आनंद उठाएँ, जिसे प्राप्त करने का हक उन्हें नहीं है तो उसे ढीठता या पशुता ही कहा जाएगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.38

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.6

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