गुरुवार, 13 जुलाई 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 14 July

🔴 धर्म प्रवचन अच्छी बात है। उसको ध्यानपूर्वक सुनना और भी अधिक अच्छा है। क्योंकि इससे जन साधारण को कर्त्तव्य बोध होता है। पर इतना ही पर्याप्त नहीं। विद्यालयों में शिक्षा सम्वर्धन का कार्य होता है। पर उस भवन में पागल कुत्ता घुस आवे या साँप किसी बिल में से निकल पड़े तो उसे लाठी से ही पाठ पढ़ाया जा सकता है। धर्मोपदेश सुनकर वे आक्रमण करना छोड़ देंगे ऐसी आशा करना नासमझी की बात है।

🔵 काशी करवट लेकर स्वर्ग जाने की मान्यता सही हो सकती है पर गीता का कृष्ण का अर्जुन को दिया गया सन्देश भी मिथ्या नहीं है जिसमें अनीति के विरुद्ध लड़ मरने की बात कही गई है। रामराज्य स्थापना से पूर्व भगवान को असुरों का दमन करना पड़ा था। धर्म की स्थापना एक इमारत उठाने की तरह है और अधर्म का नाश उससे भी अधिक आवश्यक नींव खोदने की तरह धर्म का पालन और संरक्षण योद्धा ही करते हैं। कायर तो उसकी दुहाई भर देते हैं रहते हैं।

🔴 आतंकों का दमन सशस्त्र सैनिकों का काम है। पर सामाजिक अवाँछनीयताओं, कुरीतियों, मूढ़ मान्यताओं से जूझना तो उन भावनाशीलों का कार्य है जिसमें शौर्य और पराक्रम के तत्व भी जीवित हैं। धर्मोपदेश जितना आवश्यक हैं उतना ही अभीष्ट यह भी है कि शोषण उत्पीड़न से नारी वर्ग या पिछड़े समुदायों को मुक्ति दिलाने के लिए आधार किये जायें। भले ही वे झगड़े झंझट उकसाने जैसे प्रतीत होते हों।                                          

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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