रविवार, 11 जून 2017

👉 इक्कीसवीं सदी का संविधान - हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 9)

🌹  शरीर को भगवान् का मंदिर समझकर आत्मसंयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे।

🔵 रुग्णता या बीमारी कहीं बाहर से नहीं आती। विकार तो बाहर से भी प्रविष्ट हो सकते हैं तथा शरीर के अंदर भी पैदा होते हैं, किंतु शरीर संस्थान में उन्हें बाहर निकाल फेंकने की अद्भुत क्षमता विद्यमान है। मनुष्य अपने इंद्रिय असंयम द्वारा जीवनी शक्ति को बुरी तरह नष्ट कर देता है। आहार-विहार के असंयम से शरीर के पाचन तंत्र, रक्त संचार, मस्तिष्क, स्नायु संस्थान आदि पर भारी आघात पड़ता है। बार-बार के आघात से वे दुर्बल एवं रोगग्रस्त होने लग जाते हैं। निर्बल संस्थान अंदर के विकारों को स्वाभाविक ढंग से बाहर नहीं निकाल पाते। फलस्वरूप वे शरीर में एकत्रित होने लगते हैं तथा अस्वाभाविक ढंग से बाहर निकलने लगते हैं। यही स्थिति बीमारी कहलाती है।

🔴 स्वस्थ रहने पर ही कोई अपना और दूसरों का भला कर सकता है। जिसे दुर्बलता और रुग्णता घेरे हुए होगी, वह निर्वाह के योग्य भी उत्पादन न कर सकेगा। दूसरों पर आश्रित रहेगा। परावलम्बन एक प्रकार से अपमानजनक स्थिति है। भारभूत होकर जीने वाले न कहीं सम्मान पाते हैं और न किसी की सहायता कर सकने में समर्थ होते हैं। जिससे अपना बोझ ही सही प्रकार उठ नहीं पाता, वह दूसरों के लिए किस प्रकार कितना उपयोगी हो सकता है?  

🔵 मनुष्य जन्म अगणित विशेषताओं और विभूतियों से भरा पूरा है। किसी को भी यह छूट है कि उतना ऊँचा उठे जितना अब तक कोई महामानव उत्कर्ष कर सका है, पर यह संभव तभी है, जब कि शरीर और मन पूर्णतया स्वस्थ हो। जो जितनों के लिए, जितना उपयोगी और सहायक सिद्ध होता हैं, उसे उसी अनुपात में सम्मान और सहयोग मिलता है। अपने और दूसरों के अभ्युदय में योगदान करते उसी में बन पड़ता है, जो स्वस्थ, समर्थ रहने की स्थिति बनाए रहता है। इसलिए अनेक दुःखद दुर्भाग्यों और अभिशापों में प्रथम अस्वस्थता को ही माना गया है। प्रयत्न यह होना चाहिए कि वैसी स्थिति उत्पन्न न होने पाए। सच्चे अर्थों में जीवन उतने ही समय का माना जाता है, जितना कि स्वस्थतापूूर्वक जिया जा सके। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Sankalpaa/body

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.15

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