रविवार, 11 जून 2017

👉 युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति (भाग 2)

🌹 उत्तराधिकार का पात्रत्व

🔴 अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों में से जिन विशिष्ट परिजनों का हम अपने उत्तराधिकारी के रूप में चुनाव कर रहे हैं, उनमें प्रमुख गुण यही होना चाहिए कि अपनी ही उलझनों तक सुलझे रहने में सीमित न रखकर “वसुधैव कुटुम्बकम्” की प्रवृत्ति को समुचित मात्रा में धारण किए हुए हों। घर का बड़ा वही कहलाता है जो अपने छोटे भाई बहिनों, अशक्त असमर्थों का भी पूरा ध्यान रखे। ऐसे ही गृहपति प्रशंसनीय कहे जाते हैं और वे ही उसे कुटुम्ब का ठीक तरह पालन पोषण कर सकने में समर्थ हो सकते हैं। जो व्यक्ति अपनी निजी इच्छाओं, कामनाओं को ही सर्वोपरि स्थान देता हो और उतनी ही परिधि में सोचता विचारता हो, ऐसे स्वार्थी के हाथ में यदि बूढ़े पिता का उत्तरदायित्व आ जाय तो घर के छोटे लोगों को क्या प्रसन्नता होगी ? वे सब घाटे में ही रहेंगे और संकट में ही पड़ेंगे। बूढ़ा बाप भी इतना समझदार तो होता ही है कि जिसे अपना उत्तरदायित्व सौंपे, उसमें स्वार्थपरता की मात्रा कम ही होनी चाहिए।

🔵 उपासना की दृष्टि से कई लोग काफी बढ़े-चढ़े होते हैं। यह प्रसन्नता की बात है कि जहाँ दूसरे लोग भगवान् को बिल्कुल ही भूल बैठे हैं वहाँ वह व्यक्ति ईश्वर का स्मरण तो करता है, औरों से तो अच्छा है। इसी प्रकार जो बदमाशियों से बचा है, अनीति और अव्यवस्था नहीं फैलाता, संयम और मर्यादा में रहता है, वह भी भला है। उसे बुद्धिमान कहा जायगा क्योंकि दुर्बुद्धि को अपनाने से जो अगणित विपत्तियाँ उस पर टूटने वाली थीं, उनसे बच गया। स्वयं भी उद्विग्न नहीं हुआ और दूसरों को भी विक्षुब्ध न करने की भलमनसाहत बरतता रहा। यह दोनों ही बातें अच्छी हैं- ईश्वर का नाम लेना और भलमनसाहत से रहना एक अच्छे मनुष्य के लिये योग्य कार्य हैं। उतना तो हर समझदार आदमी को करना ही चाहिए था। जो उतना ही करता है उसकी उतनी तो प्रशंसा ही की जायगी कि उसने अनिवार्य कर्तव्यों की उपेक्षा नहीं की और दुष्ट दुरात्माओं की होने वाली दुर्गति से अपने को बचा लिया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति 1965 जनवरी पृष्ठ 50
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.50

👉 हीरों से भरा खेत

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