रविवार, 18 जून 2017

👉 उन्नति के पथ पर (भाग 2)

🔵 जीवन के प्रत्येक कार्य क्षेत्र में एक से एक बढ़कर मनुष्य हैं यदि ऐसे ही विचार हों, तो उन्नति असम्भव है, क्योंकि वह मनुष्य ऐसे क्षेत्र में जाना चाहेगा जिसमें कम प्रतिद्वन्दी हों और वे उससे हरेक बात में कम हो, परन्तु ऐसा सम्भव नहीं। अतः उन्नति के प्रत्येक क्षेत्र में धैर्य और साहस तथा आत्म विश्वास की अत्यावश्यकता है। झुंझलाहट और जल्दबाजी उन्नति नहीं होने देती। उन्नति करते हुये यही ध्यान रखना चाहिये कि बस उन्नति करनी है। दूसरे उन्नत पुरुषों से आगे निकलना है इसके साथ-साथ यह भी ख्याल रखे कि कुछ भी न करने या अस्थिरता से करने की अपेक्षा एक निश्चित दिशा में स्थिरता से कुछ न कुछ निरंतर करते रहना अच्छा है। इससे अवनति की तो सम्भावना है ही नहीं परन्तु उन्नति कुछ न कुछ अवश्य होगी।

🔴 मेरे एक मित्र हैं जो बड़े जल्दबाज हैं और किसी कार्य को धैर्यपूर्वक नहीं करते। वे व्यायाम तो करते नहीं और करते भी हैं तो चाहते हैं कि “बस एक बार ही जल्दी से मोटा हो जाऊं और शरीर बना लूँ।” एक बार तो दूध के उफान जैसा जोश आता है परन्तु धीरे-धीरे धैर्य की कमी के कारण वह जोश ठंडा होने लगता है और खत्म हो जाता है। यही हाल पढ़ाई का है। वे चाहते हैं कि एक बार ही दिमाग में वृद्धि हो और फिर सभी कुछ याद कर ले। उन्हें जब यह बताया जाता है कि पढ़ने से मस्तिष्क बढ़ता है, तो कुछ पढ़ते हैं। परन्तु फिर दिमाग थकने लगता है तो कह उठते हैं “दिमाग बढ़ता ही नहीं।” वे फिर पढ़ नहीं सकते। वे कहते हैं पीछे याद किया नहीं, आगे का कैसे करूं? परन्तु वे महाशय न पीछे का याद करते हैं न आगे का। ऐसे मनुष्य यही चाहते हैं कि ऐसी बूटी घोट कर पिला दी जाय कि सभी कुछ एक बार में ही याद हो जाय।

🔵 प्रायः यह देखा जाता है कि जब कोई उत्साही विद्यार्थी भाषण देने के लिये मंच पर जाता है तो दूसरे लड़के उसे निरुत्साहित करने के लिये तालियाँ पीट देते हैं। इन लड़कों में या तो ऐसे लड़के होते हैं जो स्वयं स्टेज पर नहीं बोल सकते या ऐसे होते हैं जो उसकी उन्नति से ईर्ष्या करते हैं और उसे पतित करना चाहते हैं। संसार में लगभग ऐसे ही मनुष्य हैं जो स्वयं तो उन्नति कर नहीं सकते और दूसरों के भी उन्नति पथ में रोड़े अटकाते हैं ऐसे पुरुषों की परवाह न करके हमें तो केवल बढ़ना ही चाहिये। क्योंकि उन्नति को कष्टसाध्य समझने वाले मानव उन्नति पथ पर आपकी खिल्ली उड़ायेंगे और आपको निरुत्साहित करने की कोशिश करेंगे। परन्तु यदि आप उनकी ओर ध्यान देंगे तो आपको अपनी ही उन्नति से भय लगेगा जैसे पर्वत की चोटी पर चढ़े हुए पुरुष को उसके नीचे देखने से।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति 1948  नवम्बर पृष्ठ 23
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/November/v1.23

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