बुधवार, 14 दिसंबर 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 Dec 2016


🔴 लोभ तो सत्य का सबसे बड़ा शत्रु होता है। जिसे लोभ के पिशाच ने पकड़ लिया, उससे सत्य की रक्षा हो ही नहीं सकती। लोभ सदैव ही अपने अधिकार से अधिक पाने की लिप्सा किया करता है। अधिकार से अधिक पाने के लिए छल, कपट और असत्य आदि दुष्कर्मों को ग्रहण करना पड़ता है।

🔵 यदि आपको अपनी रुचियों और प्रवृत्तियों में कुरूपता, कुत्सा और कलुष उन्मुखता का आभास मिले तो समझ लेना चाहिए कि आपकी आत्मा सोई हुई है और साथ ही यह भी मान लेना चाहिए कि यह एक बड़ा दुर्भाग्य है-एक प्रचंड हानि है। इतना ही क्यों, वरन् तुरन्त उसे दूर करने के लिए तत्पर हो जाना चाहिए। यदि आप प्रमादवश जिस स्थिति में हैं, उसमें ही पड़े रहना चाहेंगे तो निश्चय ही अपनी ऐसी क्षति करेंगे, जो युग-युग तक, जन्म-जन्मांतरों तक पूरी नही हो सकती।

🔴 जो लोग यह सोचते हैं कि अपनी उन्नति करना एक स्वार्थ मात्र है, वे भारी भ्रम में हैं। अपना उद्धार करना संसार का उद्धार करने का प्रथम चरण है। जो अपना उपकार आप नहीं कर सकता, वह संसार अथवा किसी दूसरे का उपकार क्या कर सकता है? जो स्वयं अच्छा है, वही दूसरों को अच्छा बना सकता है, जो स्वयं उदार और निर्लोभ है, वह ही किसी दूसरे को इसकी शिक्षा दे सकने का अधिकारी है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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