शनिवार, 17 जून 2017

उन्नति के पथ पर (भाग 1)

🔵 प्रत्येक पुरुष में उन्नति की भावना हमेशा विद्यमान रहती है। उसके हृदय में अपने आप को दूसरों से अलग अनुभव करने की एक हूक सी उठती है। वह चाहता है कि मनुष्य मेरा आदर करें और मेरा नाम उन्नति शील पुरुषों की तरह प्रसिद्ध हो जाये। मनुष्य प्रायः प्रत्येक कार्य इसी उद्देश्य को लेकर करता है।

🔴 यह उन्नति की भावना एक ऐसी जल धारा है जिसका प्रवाह कभी बंद नहीं होता परन्तु प्रवाह की दिशा बदल सकती है। जब मनुष्य एक तरफ उन्नति नहीं कर पाता तो दूसरी ओर पिल पड़ता है। विद्यार्थी जब पढ़ाई में सबसे आगे नहीं हो सकता तो वह खेलों में प्रसिद्ध होना चाहता है। यदि वहाँ भी सफलता प्राप्त न हो तो वह मजाक, बदमाशी, अधिक बोलना, या कम बोलना-इनमें ही वह साथियों से कहलवा लेना चाहता है कि वह ऐसा ही है। एक प्रकार वह उन्नति अवश्य करता है परन्तु यह नहीं कह सकते कि उसकी उन्नति से जगत् की कितनी उन्नति हुई है।

🔵 जब मनुष्य उन्नति करता है या करना चाहता है, तो सबसे पहली कमी जो पथारुढ़ होने से उसे रोकती है वह है आत्म विश्वास की कमी। जब मनुष्य कार्य क्षेत्र में प्रवेश करता है तो दूसरे उन्नत पुरुषों को देखकर उसकी हिम्मत पस्त हो जाती है। “मैं कहाँ, ये कहाँ। जमीन आसमान का अन्तर हैं इनके आगे मेरी कैसे पेश चलेगी।” आदि क्षुद्र विचार उसके नवपल्लवित शुभ विचारों पर आक्रमण कर देते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति 1948  नवम्बर पृष्ठ 23
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/November/v1.23

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 45)

🌹  मनुष्य के मूल्यांकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं, उसके सद्विचारों और सत्कर्मों को मानेंगे। 🔴 दूसरों को सन...