शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

👉 शारीरिक और बौद्धिक श्रम

🔴 कई व्यक्ति भूखे मरना, तंगी में रहना, बेकारी भुगतान पसंद करते हैं, पर ऐसे कार्य करने को तैयार नहीं होते जो शारीरिक परिश्रम वाले होने के कारण `छोटे’ समझे जाते हैं। यह झिझक मिथ्या, अज्ञानमूलक एवं हानिकारक हैं। ऐसी झूठी प्रतिष्ठा के मोह में पड़े हुए व्यक्ति अपना बहुमूल्य समय यों ही गॅवाते रहते हैं और अपनी हानि करते रहते हैं। जिन्हें उन्नति के पथ पर चलना है, उन्हें परिश्रम को अपना अभिन्न मित्र बनाना होता है। 

🔵 परिश्रम ही वह दीपक है, जिसके प्रकाश में मनुष्य विकास के मार्ग को प्राप्त करता है। ऐसे सच्चे मित्र से जो व्यक्ति घृणा करता है, उसे साथ रखने में शर्म अनुभव करता है, समझ लीजिए कि ऐसे व्यक्ति न ऊँचे उठ सकेंगे, न आगे बढ़ सकेंगे। बंदूक पकड़ने में शर्म करने वाला सिपाही युद्ध में मोर्चा फतह नहीं कर सकता और न परिश्रम से झिझकने वाला व्यक्ति जीवन-संग्राम में विजय प्राप्त कर सकता है।   

🔴 परिश्रम ही संपूर्ण वैभवों का पिता है। जो जितना ही अधिक परिश्रमी होगा, वह उतना ही अधिक आनंदित रहेगा। हमारे कार्यक्रम में शारीरिक और मानसिक परिश्रम का समान स्थान होना चाहिए, दोनों की महत्ता को समान रूप में समझना चाहिए। इसीलिए विवेकवान व्यक्ति सदा से ही कर्म की सर्वोपरि महत्ता को स्वीकार करते हैं और उसके अनुसार आचरण करते रहे हैं।  

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹~अखण्ड ज्योति-मार्च 1949 पृष्ठ 1

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