शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 36)

🌹 सद्बुद्धि का उभार कैसे हो? 

🔵 आशा और विश्वास के बल पर कष्टसाध्य रोगों के रोगी-बीमारियों से लड़ते-लड़ते देर-सबेर चंगे हो जाते हैं; जबकि शंकालु, डरपोक और अशुभ चिंतन करते रहने वाले साधारण रोगों को ही तिल का ताड़ बनाकर मौत के मुँह में जबरदस्ती जा घुसते हैं। देखा गया है कि अशुभ चिंतन के अभ्यासी अपना जीवट और साहस आधी से अधिक मात्रा में अपनी अनुपयुक्त आदतों के कारण ही गँवा बैठते हैं। कठिनाइयाँ और अड़चने हर किसी के जीवन में आती हैं, पर उनमें से एक भी ऐसी न होगी जिसे धैर्य और साहसपूर्वक लड़ते हुए परास्त न किया जा सके। सहनशीलता एक ऐसा गुण है, जिसके साथ धैर्य भी जुड़ा होता है और साहस भी।    

🔴 आजीवन जेल की सजा पाये हुए कैदी भी उस विपत्ति को ध्यान में न रखकर घरेलू जैसी जिंदगी जी लेते हैं और अवधि पूरा करके वापस लौट आते हैं। सुनसान बीहड़ों में खेत या बगीचे रखाने वाले निर्भय होकर चौकीदारी करते हैं; जबकि डरपोकों को घर में चुहिया की खड़बड़ भी भूत-बला के घर में घुस आने जैसी डरावनी प्रतीत होती है। शत्रु किसी का उतना अहित नहीं कर पाते, जितनी उनके द्वारा पहुँचाई जा सकने वाली हानि की कल्पना संत्रस्त करती रहती है।                          

🔵 कुछ लोग गरीबी के रहते हुए भी हँसती-हँसाती जिंदगी जी लेते हैं, जबकि कितनों के पास पर्याप्त साधन होते हुए भी तृष्णा छाई दिखती रहती है। यह मन का खेल है। हर किसी की अपनी एक अलग दुनिया होती है, जो उसकी अपनी निज की संरचना ही होती है; परिस्थितियों और साथियों का इस निर्माण कार्य में यत्किंचित् सहयोग होता है। जीवन गीली मिट्टी की भाँति है, उसे कोई जैसी भी कुछ चाहे, आकृति दे सकता है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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