शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 83)

🌹 हमारे दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ

🔴 दुर्बुद्धि का कैसा जाल- जंजाल बिखरा पड़ा है और उसमें कितने निरीह प्राणी करुण चीत्कार करते हुए फँसे हुए जकड़े पड़े हैं, यह दयनीय दुर्दशा अपने लिए मर्मान्तक पीड़ा का कारण बन गयी। आत्मवत सर्व भूतेषु की साधना ने विश्व मानव की पीड़ा बना दिया। लगने लगा- मानों अपने ही पाँवों को कोई ऐंठ- मरोड़ और गला रहा हो। ''सब में अपनी आत्मा पिरोई हुई है और सब अपनी आत्मा में पिरोये हुए हैं। ''गीता का यह वाक्य जहाँ तक पढ़ने- सुनने से सम्बन्धित रहे वहाँ तक कुछ हर्ज नहीं, पर जब वह अनुभूति की भूमिका में उतरे और अन्त:करण में प्रवेश प्राप्त करे तो स्थिति दूसरी हो जाती है। अपने अंग अवयवों का कष्ट अपने को जैसा व्यथित बेचैन करता है, ठीक वैसे ही आत्म- विस्तार की दिशा में बढ़ चलने पर लगता है कि विश्वव्यापी दु:ख अपना दु:ख है और व्यथित पीड़ित की वेदना अपने को नोचती है।           

🔵 पीड़ित मानवता की- विश्वात्मा की, व्यक्ति और समाज की व्यथा वेदना अपने भीतर उठने और बेचैन करने लगी। आँख, डाढ़ और पेट के दर्द में बेचैन मनुष्य व्याकुल फिर रहा है कि किस प्रकार, किस उपाय से इस कष्ट से छुटकारा पाया जाये? क्या किया जाये ?? कहाँ जाया जाये ?? की हल -चल मन में उठती है और जो सम्भव है उसे करने के लिए क्षण भर का विलम्ब न करने की आतुरता व्यग्र होती है। अपना मन भी ठीक ऐसा ही बना रहा। दुर्घटना में हाथ -पैर टूटे बच्चे को अस्पताल ले दौड़ने की आतुरता में माँ अपने बुखार -जुकाम को भूल जाती है और बच्चे को संकट से बचाने के लिए बेचैन हो उठती है। लगभग अपनी मनोदशा ऐसी ही तब से लेकर अद्यावधि- चली आती है। अपने सुख- साधन जुटाने की फुरसत कहाँ है?  

🔴 विलासिता की सामग्री जहर- सी लगती है। विनोद और आराम के साधन जुटाने की बात कभी सामने आयी तो आत्म- ग्लानि ने उस क्षुद्रता को धिक्कारा, जो मरणासन्न रोगियों के प्राण बचा सकने में समर्थ पानी के लिए एक गिलास को अपने पैर धोने की विडम्बना में बिखेरने के लिए ललचाती हैं। भूख से तड़पते प्राण त्यागने की स्थिति में हुए बालकों के मुख में जाने वाला ग्रास छीनकर माता कैसे अपना भरा पेट और भरे ?? दर्द से कराहते बालक से मुँह मोड़कर पिता ताश शतरंज का साज कैसे सजाए ?? ऐसा कोई निष्ठुर ही कर सकता है। आत्मवत् सर्व भूतेषु की सम्वेदना जैसे ही प्रखर हुई, निष्ठुरता उसी क्षण गल जलकर नष्ट हो गयी। जी में केवल करूणा ही शेष रही, वही अब तक जीवन के इस अन्तिम अध्याय तक यथावत बनी हुई है। उसमें कमी रत्ती भर नहीं, वरन दिन- दिन बढ़ोत्तरी ही होती गयी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 धैर्य से काम

🔶 बात उस समय की है जब महात्मा बुद्ध विश्व भर में भ्रमण करते हुए बौद्ध धर्म का प्रचार कर रहे थे और लोगों को ज्ञान दे रहे थे। 🔷 एक ब...