शनिवार, 18 मार्च 2017

👉 सहकारिता ने गवर्नर बनाया

🔴 आगे पढ़ने की बहुत इच्छा थी पर करते क्या पास में तो गुजारे का भी प्रबध नहीं था। युवक ने सोचा बाहर चलना चाहिए, आजीविका और पढा़ई के खर्च का प्रबंध आप करके पढ़ना अवश्य है। ऐसा निश्चय करके उसने अभिभावकों से २० रुपये और किराए का प्रबध करा लिया और बंबई चला आया।

🔵 उन दिनों बंबई इतनी महँगी नहीं थी जितनी आज है। पाँच रुपये मासिक पर मकान किराए में मिल जाता था। पर जिसके पास आदि से अंत तक २० रुपये ही थे, उसके लिये पाँच ही पहाड के बराबर थे। अब क्या किया जाए ? यदि ५ रुपये मासिक किराए का कमरा लेता हूँ तो २० रुपये कुल ४ महीने के किराए भर के लिए है ? इस विचार-चिंतन के बीच युवक को एक उपाय सूझा सहयोग और सहकारिता का जीवन।

🔴 एक सीक बुहारी नहीं कर सकती, अकेला व्यक्ति सेना नहीं खडा़ कर सकता। एक लडके के लिए स्कूल खुले तो संसार की अधिकांश धनराशि पढाई मे ही चली जाए। इसी प्रकार की दिक्कतों से बचने के लिए सहकारिता एक देवता है जिसमें छोटी-छोटी शक्तियाँ एक करके अनेक लोग महत्त्वपूर्ण साधन सुविधाएं जुटा लेते हैं छोटी शक्तियां मिलकर बडे लाभ अर्जित कर ले जाती हैं। जिस समाज, जिन देशों में सहयोग और सहकरिता का भाव जितना अधिक होगा वह देश उतना सुखी, सशक्त और समुन्नत होगा।

🔵 यह उदाहरण युवक का प्रकाश बन गया। उसने अपनी तरह के ४ और निर्धन विद्यार्थी खोज लिए और एक कमरा ५ रुपए मासिक पर किराये में ले लिया। प्रत्येक लडके को अब १ रुपए मासिक देना होगा। इस तरह जो २० रुपये केवल ५ माह के किराए भर के लिए पर्याप्त होते। युवक की सूझ-बूझ ने यह सिद्ध कर दिया कि यदि उन्हें किराए में ही खर्च किया जाता तो ५ गुना अधिक समय अर्थात् २० महीने के लिये पर्याप्त होते।

🔴 फिर सामने आइ भोजन की समस्या यदि अकेले ही भोजन पकाते, २० रुपये एक ही महीने के लिए होते। लकडी, कोयले, बर्तन एक व्यक्ति के लिए भी उतने ही चाहिए जितने में ५ व्यक्ति आराम से खाना बनाकर खा लेते। व्यक्तिवाद  सामूहिकता से हर दृष्टि से पीछे है। सामूहिक परिवार आर्थिक और भावनात्मक दृष्टि से भी लामदायक है। उन्होंने इस वैज्ञानिक लाभ के कारण को प्रतिष्ठपित किया।

🔵 युवक ने इस समस्या का हल भी ऐसे ही निकाला। एक ढा़बा ढूढ़ लिया, जिसमें कई लोगों का खाना एक साथ पकता था। यह भी उसमे सम्मिलित हो गये, मासिक खर्च कुल ५ रुपया आया। जो पैसे १ महीने के खाना देने भर के लिए थे अब उनसे कम से कम ४ माह की निश्चितता हो गई।

🔴 अब रही बात पढ़ने की सो वह एक स्कूल में भरती हो गया। किताबों का खर्च था उसे भी सामूहिकता के स्वरूप पीटिट नामक पुस्तकालय ने कर दिया। अनेक लोगों के सहयोग और चंदे से बना पुस्तकालय न होता तो उससे इस युवक की तरह सैकडो हजारों लोगों की ज्ञानार्जन की पिपासाऐं अतृप्त ही रह गइ होती। एक रुपये की सदस्यता से पढी़ इस स्कोल की पुस्तके काम देती गई। आप विश्वास न करेंगे उसने इसी तरह एडवोकेट बनने तक की शिक्षा पाई। इस बीच वह कई स्थानों पर लिखने का काम करता रहा, जिससे वह कपड़े-लत्ते शाक-भाजी का खर्च निकालता रहा। इस युवक का नाम था कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी (के० एम० मुंशी) जो एक समय उत्तर प्रदेश के गवर्नर पद तक पहुँचे और जो देश के माने हुए साहित्यकार एवं राजनैतिक नेता थे।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 89, 90

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