शनिवार, 18 मार्च 2017

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 18)

🌹 उदारता जन्मदात्री है प्रामाणिकता की   
🔵 दूसरा सद्गुण जो इतना ही आवश्यक है, वह है-उदारता जिसके अंतराल में करुणा, ममता, सेवा-सहायता की कोमलता है, वही दूसरों को भी निष्ठुरता से विरत कर सकता है, करुणाकर बना सकता है। ईश्वर की अनुकंपा उन्हें मिलती है, जो दूसरों पर अनुकंपा करने में रुचि रखते हैं। निष्ठुरों की कठोरता और संकीर्ण स्वार्थपरता देखकर पड़ोसियों से लेकर भगवान् तक की अनुकंपा वापस लौट जाती है। असुरों की निष्ठुरता और अनैतिकता प्रसिद्ध है, इसलिये उनका अंत भी अन्यत्र से दौड़ पड़ने वाली निष्ठुरता के द्वारा ही होता है। असुरों के वध की कथाएँ प्राय: इसी तथ्य से सनी हुई मिलती हैं।       

🔴 पूजा-पाठ का उद्देश्य आत्म-परिष्कार और सत्प्रवृत्ति-संवर्धन की उदारता जगाना भर है। यदि भाव-कृत्यों से ये दोनों उद्देश्य सध रहे हों तो समझना चाहिये कि उनका समुचित लाभ मिलेगा किंतु यदि क्रिया मात्र चल रही हो और सद्भावनाओं के विकास-परिष्कार पर उनका कोई प्रभाव न पड़ रहा हो तो समझना चाहिये कि क्रियाकलापों की लकीर भर पीटी जा रही है और उसके सहारे आत्म-प्रवंचना जैसी ही कुछ विडंबना बन पड़ेगी। इन दिनों प्राय: ऐसा ही खेल-खिलवाड़ चलता रहा है और लोग देवी-देवताओं की हजामत बनाने के लिये चित्र-विचित्र स्वांग रचते और बड़ी मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रतीक्षा करते रहे हैं।       

🔵 देवता उतने मूर्ख हैं नहीं, जितने कि समझे जाते हैं। हेय स्तर का व्यक्ति ही छोटे-मोटे उपहारों या कथन-श्रवणों से भरमाया जा सकता है, पर देवता तो वास्तविकता परखने में प्रवीण होते हैं; साथ ही इतने दरिद्र भी नहीं हैं कि छोटे-छोटे उपहारों के लिये आँखें मूँदकर दौड़ पड़ें; जो माँगा गया है उसे मुफ्त में ही बाँटते-बखेरते रहें। यही कारण है कि मनौती मनाने के लिये पूजा-पत्री का सरंजाम जुटाने वालों में से अधिकांश को निराश रहना पड़ता है। आरंभ में जो लॉटरी खुलने जैसा उत्साह होता है, वह परीक्षा की कसौटी पर कसे जाने पर निरर्थक ही सिद्ध होता है। आस्तिकता के प्रति उपेक्षा-आशंका का भाव बढ़ते जाने का एक बड़ा कारण यह भी है कि लोग कम कीमत में बहुमूल्य वस्तुएँ पाने की आशा लगाने लगते हैं और जब वह विसंगति गलत सिद्ध होती है तो कभी साधना को, कभी देवता को और कभी अपने भाग्य को दोष देते हुए भविष्य के लिये एक प्रकार से अनास्थावान् ही बन जाते हैं।
   
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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