शनिवार, 18 मार्च 2017

👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 22)

🌹 प्रगति के कदम-प्रतिज्ञाएँ

🔴 दूसरों में गलतियाँ हैं। ये कौन नहीं कहता? लेकिन दूसरों की गलतियों को प्रेम से सुधारा जाना चाहिए ,  उनको बताया जाना चाहिए, उसको संतुलित होकर के ठीक किया जाना चाहिए। नहीं होता, तो बिलकुल दिल में नहीं रखना चाहिए, आवेश में नहीं आना चाहिए। बात- बात में गुस्से की क्या बात है? काम, क्रोध, लोभ और केवल एक कुटुम्ब से, एक घर से, एक शरीर से अपनापन जोड़ लेना, इसको मोह कहते हैं।       

🔵 आदमी एक शरीर से क्यों जुड़ा हुआ रहे? सभी शरीरों में अपनी आत्मा को समाया हुआ क्यों नहीं देखे। सारे समाज को एक कुटुम्ब क्यों नहीं माने? चंद आदमियों को ही कुटुम्ब क्यों माने? इस तरीके से ये संकीर्णता की भावना को मोह कहते हैं और ये काम, क्रोध, लोभ और मोह मानसिक विकार हैं और ये मानसिक पाप कहे जाते हैं। इससे आदमी को अपने आपको उठाना चाहिए।  

🔴 हराम की कमाई खाना भी एक बहुत बड़ा पाप है। बिना परिश्रम किये आप क्यों खायें? आपने मजदूरी करने के लिए प्रतिज्ञा की है, पूरी मजदूरी क्यों नहीं करें? पूरी मजदूरी का अर्थ है- पसीने की कमाई खानी चाहिए और हराम का पैसा नहीं ही खाना चाहिए। आज कल जुआ खेलने का रिवाज, सट्टा खेलने का रिवाज, लॉटरी लगाने का रिवाज बहुत बुरी तरह से बढ़ रहा है और बाप- दादों की हराम की कमाई उत्तराधिकार में खाने का रिवाज भी बुरी तरह से बढ़ रहा है। इन बुरे रिवाजों को बंद करना चाहिए। आदमी को सिर्फ अपनी मेहनत- मशक्कत की कमाई खानी चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Diksha/f

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