रविवार, 19 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 41)

🌹 श्रेष्ठ व्यक्तित्व के आधार सद्विचार

🔴 विचार-धारा में जीवन बदल देने की कितनी शक्ति होती है, इसका प्रमाण हम महर्षि बाल्मीकि के जीवन में पा सकते हैं। महर्षि बाल्मीकि अपने प्रारम्भिक जीवन में रत्नाकर डाकू के नाम से प्रसिद्ध थे। उनका काम राहगीरों को मारना, लूटना और उससे प्राप्त धन से परिवार का पोषण करना था। एक बार देवर्षि नारद को उन्होंने पकड़ लिया। नारद ने रत्नाकर से कहा कि तुम यह पाप क्यों करते हो? चूंकि वे उच्च एवं निर्विकार विचारधारा वाले थे इसलिए रत्नाकर डाकू पर उनका प्रभाव पड़ा, अन्यथा भय के कारण किसी भी वंचित व्यक्ति ने उनके सामने कभी मुख तक नहीं खोला था। उसका काम तो पकड़ना, मार डालना और पैसे छीन लेना था, किसी के प्रश्नोत्तर से उसका कोई सम्बन्ध नहीं था। किन्तु उसने नारद का प्रश्न सुना और उत्तर दिया—‘‘अपने परिवार का पोषण करने के लिए।’’

🔵 नारद ने पुनः पूछा कि ‘‘जिनके लिए तुम इतना पाप कमा रहे हो, क्या वे लोग तुम्हारे पाप में भागीदार बनेंगे।’’ रत्नाकर की विचारधारा आन्दोलित हो उठी, और वह नारद को एक वृक्ष से बांधकर घर गया और परिजनों से नारद का जिक्र किया और उनके प्रश्न  का उत्तर पूछा। सबने एक स्वर में निषेध करते हुए कह दिया कि हम सब तो तुम्हारे आश्रित हैं। हमारा पालन तुम्हारा कर्तव्य है, तुम पाप करते हो तो इसमें हम लोगों को क्या मतलब? अपने पाप के भागी तुम खुद होंगे। 

🔴 परिजनों का उत्तर सुनकर रत्नाकर की आंखें खुल गईं। उसकी विचार-धारा बदल गई और नारद के पास आकर दीक्षा ली और तप करने लगा। आगे चलकर वही रत्नाकर डाकू महर्षि बाल्मीकि बने और रामायण महाकाव्य के प्रथम रचयिता। विचारों की शक्ति इतनी प्रबल होती है कि वह देवता को राक्षस और राक्षस को देवता बना सकती है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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