रविवार, 19 मार्च 2017

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 19)

🌹 उदारता जन्मदात्री है प्रामाणिकता की   

🔵 हमें तथ्यों को समझना चाहिये। प्रामाणिकता की परख होने पर ही कोई बड़े काम, दायित्व या अधिकार सौंपे जाते हैं। ईश्वर के दरबार में भी यही नियम है। वहाँ साधना का अर्थ जीवनचर्या के हर पक्ष में आदर्शवादिता और प्रामाणिकता का समावेश लगाया जाता है। जो भी इस कसौटी पर खरा उतरता है, उसको हर स्वर्णकार की तरह सम्मानपूर्वक उचित मूल्य मिलता है, पर पीतल को सोना बनाकर बेचने की फिराक में फिरने वाले को हर कहीं दुत्कारा जाता है।          

🔴 छोटे बच्चे को खड़ा होने और धीरे-धीरे चलने में सहारा देने के लिये पहिये की हाथगाड़ी बना दी जाती है। बच्चे को खड़ा तो अपने ही पैरों पर होना पड़ता है, पर उस गाड़ी की सहायता मिलने से कार्य सरल हो जाता है। ठीक इसी प्रकार पूजा-अर्चा मनुष्य के व्यक्तित्व को प्रामाणिक बनाने भर के लिये की जानी चाहिये अन्यथा भीतर घटियापन छाया रहने पर यह भी कहा जा सकता है कि साधना का सटीक अर्थ न समझा गया-उसे सही रीति से संपन्न न किया जा सका।          

🔵 उदारमना होना भी ईश्वर-भक्ति का अविच्छिन्न अंग है। कृपणता, निष्ठुरता एवं संकीर्ण स्वार्थपरता उसके रहते टिक ही नहीं सकती। संत, भक्तजन, इसीलिये अमीर नहीं रहते कि वे उपलब्धियों का न्यूनतम उपयोग करके जो बचत संभव हो, उसे प्रसन्नतापूर्वक परमार्थ-प्रयोजनों में लगाते रहे। यह उदारता ही उनमें दैवी उदारता का आह्वान करती और उसे घसीटकर बड़ी मात्रा में सामने ले आती है। बादल उदारतापूर्वक बरसते रहते हैं। समुद्र उनके भंडार को खाली न होने की प्रतिज्ञा निभाते रहते हैं। नदियाँ भूमि पर प्राणियों की प्यास बुझाती हैं। उनमें जल कम न पड़ने पाये, इसकी जिम्मेदारी हिमालय पर पिघलती रहने वाली बरफ उठाती है। 

🔴 पेड़ बिना मूल्य फल देते रहते हैं, बदले में नई फसल पर उन्हें उतने ही नये फल बिना मूल्य मिल जाते हैं। गाय दूध देती है। इससे उसका थन खाली नहीं हो जाता; सबेरे खाली हो गया थन शाम तक फिर उतने ही दूध से भर जाता है। धरती बार-बार अन्न उपजाती है। उसकी उर्वरता अनादिकाल से बनी हुई है और अनंतकाल तक अक्षुण्ण बनी रहेगी। उदार सेवा-भावना का जिसके चिंतन और व्यवहार मे जितना पुट है, समझना चाहिये कि उस प्रामाणिक व्यक्ति को समाज का सम्मान भरा सहयोग और ईश्वर का अनुदान उसी अनुपात में निरंतर मिलता रहेगा।   
     
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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