रविवार, 19 मार्च 2017

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 25)

🌹 आगे बढ़ें और लक्ष्य तक पहुँचें     

🔴 व्यक्तित्व का परिष्कार ही प्रतिभा परिष्कार है। धातुओं की खदानें जहाँ भी होती हैं, उस क्षेत्र के वही धातु कण मिट्टी में दबे होते हुए भी उसी दिशा में रेंगते और खदान के चुम्बकीय आकर्षणों से आकर्षित होकर पूर्व संचित खदान का भार, कलेवर और गौरव बढ़ाने लगते हैं। व्यक्तित्ववान अनेकों का स्नेह, सहयोग, परामर्श एवं उपयोगी सान्निध्य प्राप्त करते चले जाते हैं। यह निजी पुरुषार्थ है। अन्य सुविधा-साधन तो दूसरों की अनुकम्पा भी उपलब्ध करा सकता है; किन्तु प्रतिभा का परिष्कार करने में अपना सङ्कल्प, अपना समय और अपना पुरुषार्थ ही काम आता है। इस पौरुष में कोताही न करने के लिए गीताकार ने अनेक प्रसंगों पर विचारशीलों को प्रोत्साहित किया है। एक स्थान पर कहा गया है कि मनुष्य स्वयं ही अपना शत्रु और स्वयं ही अपना मित्र है। इसलिए अपने को उठाओ, गिराओ मत।                           
🔵 पानी में बबूले अपने भीतर हवा भरने पर उभरते और उछलते हैं; पर जब उनका अन्तर खोखला ही हो जाता है, तो उनके विलीन होने में भी देर नहीं लगती। अन्दर जीवट का बाहुल्य हो, तो बाहर का लिफाफा आकर्षक या अनाकर्षक कैसा भी हो सकता है; किन्तु यदि ढकोसले को ही सब कुछ मान लिया जाए और भीतर ढोल में पोल भरी हो, तो ढम-ढम की गर्जन-तर्जन के सिवाय और कुछ प्रयोजन सधता नहीं। पृथ्वी मोटी दृष्टि से जहाँ की तहाँ स्थिर रहती प्रतीत होती है; पर उसकी गतिशीलता और गुरुत्वाकर्षण शक्ति इस तेजी से दौड़ लगाती है कि एक वर्ष में सूर्य की लम्बी कक्षा में परिभ्रमण कर लेती है और साथ ही हर रोज अपनी धुरी पर भी लट्टू की तरह घूम जाती है।

🔴 कितने ही व्यक्ति दिनचर्या की दृष्टि से एक ढर्रा ही पूरा करते हैं; किन्तु भीतर वाली चेतना जब तेजी से गति पकड़ती है तो वे सामान्य परिस्थितियों में गुजर करते हुए भी उन्नति के उच्च शिखर तक जा पहुँचते हैं। सामर्थ्य भीतर ही रहती, बढ़ती और चमत्कार दिखाती है। उसी को निखारने, उजागर करने पर तत्परता बरती जाए तो व्यक्तित्व की प्रखरता इतनी सटीक होती है, कि जहाँ भी निशाना लगता है, वहीं से आर-पार निकल जाता है।              
     
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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