बुधवार, 15 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 37)

🌹 श्रेष्ठ व्यक्तित्व के आधार सद्विचार

🔴 कितनी ही सज्जनोचित वेशभूषा में क्यों न हो, दुष्ट दुराचारी को देखते ही पहचान लिया जाता है, साधु तथा सिद्धों के वेश में छिपकर रहने वाले अपराधी अनुभवी पुलिस की दृष्टि से नहीं बच पाते और बात की बात में पकड़े जाते हैं। उनके हृदय का दुर्भाव उनका सारा आवरण भेद कर व्यक्तित्व के ऊपर बोलता रहता है।

🔵 जिस प्रकार के मनुष्य के विचार होते हैं वस्तुतः वह वैसा ही बन जाता है। इस विषय में एक उदाहरण बहुत प्रसिद्ध है। बताया जाता है कि भृंगी पतंग झींगुर को पकड़ लाता है और बहुत देर तक उसके सामने रहकर गुंजार करता रहता है यहां तक कि उसे देखते-देखते बेहोश हो जाता है। उस बेहोशी की दशा में झींगुर की विचार परिधि निरन्तर उस भृंगी के स्वरूप तथा उसकी गुंजार से घिरी रहती है जिसके फलस्वरूप वह झींगुर भी निरन्तर में भृंगी जैसा ही बन जाता है। इसी भृंगी तथा कीट के आधार पर आदि कवि वाल्मीकि ने सीता और राम के प्रेम का वर्णन करते हुए एक बड़ी सुन्दर उक्ति अपने महाकाव्य में प्रस्तुत की है।

🔴 उन्होंने लिखा कि सीता ने अशोक-वाटिका की सहचरी विभीषण की पत्नी सरमा से एक बार कहा—सरमे! मैं अपने प्रभु राम का निरन्तर ध्यान करती रहती हूं। उनका स्वरूप प्रतिक्षण मेरी विचार परिधि में समाया रहता है। कहीं ऐसा न हो कि भृंगी और पतंग के समान इस विचार तन्मयता के कारण में राम-रूप हो ही जाऊं और तब हमारे दाम्पत्य-जीवन में बड़ा व्यवधान पड़ जायेगा। सीता की चिन्ता सुनकर सरमा ने हंसते हुए कहा—देवी! आप चिंता क्यों करती हैं, आपके दाम्पत्य-जीवन में जरा भी व्यवधान नहीं पड़ेगा।

🔵 जिस प्रकार आप भगवान के स्वरूप का विचार करती रहती हैं उसी प्रकार राम भी तो आपके रूप का चिन्तन करते रहते हैं। इस प्रकार यदि आप राम बन जायेंगे तो राम सीता बन जायेंगे। इससे दाम्पत्य-जीवन में क्या व्यवधान पड़ सकता है? परिवर्तन केवल इतना होगा कि पति पत्नी और पत्नी पति बन जायेगी।’’ इस उदाहरण में कितना सत्य है नहीं कहा जा सकता किन्तु यह तथ्य मनोवैज्ञानिक आधार पर पूर्णतया सत्य है कि मनुष्य जिन विचारों का चिन्तन करता है उसके अनुरूप ही बन जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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