बुधवार, 15 मार्च 2017

👉 धर्म पर आस्था रखने वाले दया न छोडे़ं

🔵 नावेल्ड (अलवानिया) का एक छोटा देहाती गाँव है, जहाँ अधिकांश कृषक रहते हैं वहाँ की परंपरा और स्थिति ऐसी है, जिससे वहाँ अधिकांश व्यक्ति मांसाहार को स्वाभाविक भोजन मानते और प्रयोग करते हैं।

🔴 ऐसे ही एक कृषक परिवार का छोटा बालक न्यूनररिचे पास के मिशन स्कूल में भर्ती हुआ। स्कूल में सामान्य शिक्षा के अतिरिक्त एक घंटा धर्म-शिक्षा की भी होती थी। ढर्रा मुद्दतों से चल रहा था। पादरी बाइबिल पढाते और लड़के उसे पढते। ऊँचे आदर्शों की चर्चा होती, ईसाई धर्म का गौरव बताया जाता पर था वह सब धर्म-शिक्षण-जानकारी की आवश्यकता पूरी करने तक ही सीमित।

🔵 एक दिन धर्म-शिक्षा के घंटे में पादरी प्रभु यीशु की सहृदयता और शिक्षा की विवेचना कर रहे थे। वे बता रहे थे- 'यीशु ने दया और करुणा की सरिता बहाई और अपने अनुयायियों को हर प्राणी के साथ दया का, सहृदय व्यवहार करने का उपदेश दिया। सच्चे ईसाई को ऐसा ही दयावान् होना चाहिए।"

🔴 यह सब एक लकीर पीटने के लिये पढा़-पढाया जाता था। पर बालक रिचे ने उसे गंभीर रूप में लिया। वह कई दिन तक लगातार यही सोचता रहा क्या हम सच्चे ईसाई नहीं है "क्या हम प्रमु यीशु के उपदेशों को कहते-सुनते भर ही है ? उन्हें अपनाते क्यों नहीं ? उन पर चलते क्यों नहीं ?

🔵 बालक ने कई दिन तक अपने घर में मांस के लिये छोटे जानवरों और पक्षियों का वध होते देखा था। उनके कष्ट और उत्पीडन को भी आँसू भरकर देखा था। कोमल भावना वाले बालक ने एक दिन इस दृश्य को देखकर, तडफते हुये प्राणी के साथ अपनी आत्मीयता जोड़ी तो उसे लगा जैसे उसी को काटा उधेडा जा रहा है। बेचारा घर से बाहर चला गया और सुबक सुबक कर घंटों रोता रहा।

🔴 तब वह इतना छोटा था कि अपने मनोभाव घर के लोगों पर ठीक तरह प्रकट नही कर सकता था पर अब वह बडा़ हो चला था, लगभग दस साल का। अपनी संवेदनाओं को प्रकट करने लायक शब्द उसके हाथ आ गये थे। अपनी वेदना उसने दूसरे दिन शिक्षक पादरी के सामने रखी और पूछा क्या मांस के लिए पशु-पक्षियों की हत्या करना ईसाई धर्म के और प्रमु यीशु की शिक्षाओ के अनुरूप है।

🔵 पादरी स्वयं मांस खाते थे। वहाँ घर-घर में माँस खाया जाता था। इसलिये स्पष्ट न कह सके। अगर-मगर के साथ दया और मांसाहार के प्रतिपादन के समर्थन की बात बताने लगे। आत्मय शिक्षक बालक के गले सुशिक्षित पादरी की लंबी-चौडी व्याख्या तनिक भी न उतरी। उसे लगा वह बहकाया जा रहा है। यदि दया, धर्म का अंग है, तो उसे धर्मात्मा लोग हर प्राणी के लिए प्रयोग क्यो न करें?  यदि धर्म वास्तविक है तो उसे व्यवहार में क्यों न उतारा जाए ?

🔴 बालक रिचे ने निश्चय किया कि वह सच्चा ईसाई बनेगा, प्रभु यीशु का सच्चा अनुयायी। उसने मांस न खाने का निश्चय कर लिया। सामने भोजन आया तो उसने मांस की कटोरी दूर हटा दी। कारण पूछा गया तो उसने यह कहा-यदि हम धर्म पर आस्था रखते है तो हमें उसकी शिक्षाओं को व्यवहार में भी लाना चाहिए।
हत्यारे और रक्तपिपासु लोग धर्मात्म नही हो सकते।' घर के लोगों ने मांस न खाने से शरीर कमजोर हो जाने की दलील दी तो उसने पूछा-क्या शारीरिक कमजोरी आत्मिक पतन से अधिक घृणित है ? घर वालों का समझाना-बुझाना बेकार चला गया, रिचे ने माँस खाना छोडा सो छोड ही दिया।

🔵 ईसाई धर्म और यीशु की दया शिक्षा का प्रसंग जहाँ भी चलता तब रिचे रूखे कंठ और डब-डबाई आँखों से यही पूछता- क्या पेट को बूचडखाना बनाए रखने वालों को धर्म और परमेश्वर की चर्चा करने का अधिकार है ? लोगों के तर्क कुंठित हो जाते और सच्चाई के आगे सिर नीचा हो जाता।

🔴 बालक रिचे जब भी मांस की प्राप्ति के लिए होने वाले उत्पीड़न पर विचार करता तभी उसकी आत्मा रो पडती इस मनोदशा से उसकी माँ प्रभावित हुई फिर दोनों बडी बहिन। तीनों ने माँस छोडा। भावनओं का मोड अशुभ या शुभ की दिशा में जिधर भी मुड चले उधर बढ़ता ही जाता है। इस प्रकर सारे परिवार ने मांस खाना छोड़ दिया। यह हवा आगे बडी। पडोस और परिचय क्षेत्र में यह विचार जड जमाने लगा कि सच्चे धर्मात्मा को दयालु होना ही चाहिए। जो दयालु होगा वह मांसाहार कर कैसे सकेगा ?

🔵 रिचे बडे़ होकर पादरी बने। उन्होंने घर घर घूमकर सच्ची धार्मिकता का प्रचार किया और माँसाहार से विरति उत्पन्न कराई।

🔴 श्रद्धालु धर्म प्रेमियों की संस्था नामक संगठन ने अलबानिया में अनेकों धर्म-प्रचारकों तथा प्रचार-सामग्री के माध्यम से जो लोक शिक्षण किया, उससे प्रभावित होकर लाखों व्यक्तियों ने मांसाहार छोडा़ और धार्मिकता अपनाई। रिचे के सत्प्रयत्नों को धार्मिक क्षेत्रों में सराहा जाता रहा है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 83, 84

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