शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

👉 सफाई तो स्वाभाविक धर्म

🔴 सफाई को वे गाँधी जी की तरह अत्यावश्यक धर्म मानते थे और उनकी भी यह धारणा व्यावहारिक थी कि सफाई, जैसी आवश्यक वस्तु के लिये न तो दूसरों पर निर्भर रहना चाहिए और न ही उसे छोटा और घृणित कार्य मानना चाहिए। सफाई ऐसी व्यवस्था है, जिससे स्वास्थ्य और मानसिक प्रसन्नता चरितार्थ होती है, उससे दैनिक जीवन पर बडा़ सुंदर प्रभाव पड़ता है। इसलिए छोटा हो या बडा़ सफाई का कार्य सबके लिए एक जैसा है।

🔵 आफिसों के लोग, साधारण पदवी वाले कर्मचारी और घरों में भी जो लोग थोडा बहुत पढ-लिख जाते हैं, वे अपने आपको साफ-सुथरा रख सकते हैं। पर अपने आवास और पास-पडोस को साफ रखने से शान घटने की ओछी धारणा लोगों में पाई जाती है, किंतु उनको यह बात बिल्कुल भी छू तक न गई थी।

🔴 बात पहुत पहले की नहीं, तब की है जब वे प्रधानमंत्री थे, पार्लियामैंट से दोपहर का भोजन करने वे  अपने आवास जाया करते थे एक दिन की बात है घर के बच्चों ने तमाम् कागज के टुकडे फाड फाड कर चारों तरफ फैला दिये थे। खेल-खेल में और भी तमाम गंदगी इकट्ठी हो गई थी घर के लोग दूसरे कामों मे व्यस्त रहे, किसी का ध्यान इस तरफ नहीं गया कि घर साफ नहीं है और उनका भोजन करने का वक्त हो गया है।

🔵 प्रधान मंत्री नियमानुसार दोपहर के भोजन के लिए घर पहुँचे घर में पाँव रखते ही उनकी निगाह सर्वप्रथम घर की अस्त-व्यस्तता और गंदगी पर गई। दूसरा कोई होता तो नौकर को बुलाता घर बालों को डॉटता। पर उनका कहना था ऐसा करना मनुष्य का छोटापन व्यक्त करता है। सामने आया हुआ छोटा काम भी यदि भावनापूर्वक किया जाता है, तो उस छोटे काम का भी मूल्य बड़ जाता है, और सच पूछो तो छोटे छोटे कामों को भी लगन और भवनापूर्वक करने की इन्हीं सुंदर आदतों और सिद्धंतों ने उन्हें एक साधारण किसान के बेटे से विशाल गणराज्य का प्रधानमंत्री प्रतिष्ठित किया था।

🔴 उन्होंने न किसी को बुलाया, न डॉट-फटकार लगाई चुपचाप झाडू उठाया और कमरे में सफाई शुरु कर दी, तब दूसरे लोगों का भी ध्यान उधर गया पहरे के सिपाही, घर के नौकर उनकी धर्मपत्नि सब जहाँ थे, वही निर्वाक खडे देखते रहे और वे चुपचाप झाडू लगाते रहे। किसी को बीच में टोकने का साहस न पड़ा, क्योकि उनकी कडी़ चेतावनी थी काम करने के बीच में कोई भी छेडना अच्छा नहीं होता।

🔵 सफाई हो गई तो ये लोग मुस्कराते हुए रसोइ पहुँचे। ऐसा जान पडता था कि इनके मन मे झाडू लगाने से कोइ कष्ट नहीं पहुँचा वरन मानसिक प्रसन्नता बढ़ गई है।

🔴 धर्मपत्नी ने विनीत भाव से हाथ धोने के पानी देते हुए कहा- हम लोगों की लापरवाही से आपको इतना कष्ट उठाना पडा़ तो वे हँसकर बोले- हाँ लापरवाही तो हुई पर मुझे सफाई से कोई कष्ट नहीं हुआ। यह तो हर मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है कि यह अपनी और अपने पडो़सी की बेझिझक सफाई रखा करे।

🔵 सब कुछ जहाँ का तहाँ व्यवस्थित हुआ, वे भोजन समाप्त कर फिर अपने नियत समय पर पार्लियामेंट लौट आए। अब जानना चाहेंगे अपने ऐसे आदर्शों के बल पर साधारण व्यक्ति से प्रधानमंत्री बनने वाले कौन थे ? वह और कोई नहीं लाल बहादुर शास्त्री थे। उन्होंने साबित कर दिया कि मनुष्य जन्मजात न तो बडा होता है, न प्रतिष्ठा का पात्र। उसको बडा़ उसका काम, उसकी सच्चाई और ईमानदारी बनाती है। उनका सपूर्ण जीवन ही ऐसे उद्धरणों से परिपूर्ण है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 50, 51

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