शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 62)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू

🔵 आत्मकथा लिखने के आग्रह को केवल इस अंश तक पूरा कर सकते हैं कि हमारा साधना क्रम कैसे चला। वस्तुत: हमारी सारी उपलब्धियाँ प्रभु समर्पित साधनात्मक जीवन प्रक्रिया पर ही अवलम्बित है। उसे जान लेने से इस विषय में रूचि रखने वाले हर व्यक्ति को वह रास्ता मिल सकता है, जिस पर चल कर कि आत्मिक प्रगति और उससे जुड़ी विभूतियों का आनंद लिया जा सकता है। पाठकों को अभी इतनी ही जानकारी हमारी कलम से मिल सकेगी, सो उतने से ही इन दिनों सन्तोष करना पड़ेगा।

🔴 ६० वर्ष के जीवन में से १५ वर्ष का आरम्भिक बाल जीवन कुछ विशेष महत्त्व का नहीं है। शेष पाँच वर्ष हमने आध्यात्मिकता के प्रसंगों को अपने जीवन- क्रम में सम्मिलित करके बिताये हैं, पूजा- उपासना का उस प्रयोग में बहुत छोटा अंश रहा है। २४ वर्ष तक ६ घंटे रोज की गायत्री उपासना को उतना महत्व नहीं दिया जाना चाहिए, जितना कि मानसिक और भावनात्मक उत्कृष्टता के अभिवर्धन के प्रयत्नों को। यह माना जाना चाहिए कि यदि विचारणा और कार्यपद्धति को परिष्कृत न किया गया होता, तो उपासना के कर्मकाण्ड उसी तरह निरर्थक चले जाते, जिस तरह कि अनेक पूजा- पत्री तक सीमित मन्त्र- तन्त्रों का ताना- बाना बुनते रहने वालों को नितान्त खाली रहना पड़ता है।

🔵 हमारी जीवन साधना को यदि सफल माना जाए और उसमें दीखने वाली अलौकिकता को खोजा जाए तो उसका प्रधान कारण हमारी अन्तरंग और बहिरंग स्थिति के परिष्कार को ही माना जाए। पूजा उपासना को गौण समझा जाए। आत्मकथा के एक अंश को लिखने का दुस्साहस करते हुए हम एक ही तथ्य का प्रतिपादन करेंगे कि हमारा सारा मनोयोग और पुरुषार्थ आत्म- शोधन में लगा है। उपासना जो बन पड़ी है, उसे भी हमने भाव परिष्कार के प्रयत्नों के साथ पूरी तरह जोड़ रखा है। अब आत्मोद्घाटन के साधनात्मक प्रकरण पर प्रकाश डालने वाली कुछ चर्चाएँ पाठकों की जानकारी के लिए करते हैं_

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/hamari_jivan_saadhna

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