शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 29)

🌹 उदारता अपनाई ही जाए  

🔵 बिच्छू के बारे में सुना जाता है कि उसके बच्चे माँ का पेट खा पीकर तब बाहर निकलते हैं। लगता है मनुष्य ने कहीं बिच्छू की रीति-नीति तो नहीं अपना ली हैं, जिससे वह उस प्रकृति का सर्वनाश करके रहे, जो उसके जीवन धारणा करने का प्रमुख आधार है। खीझी हुई प्रकृति क्या बदला ले सकती है? अणु उपकरणों के बदले क्या प्रकृति ही सर्वनाश, महाप्रलय सामने लाकर खड़ी कर सकती है? यह सब सोचने की मानो किसी को फुरसत ही नहीं हैं।      

🔴 मनुष्य का मनुष्य के प्रति व्यवहार निराशाजनक स्तर तक नीचे गिर गया है। उसने अपनी सत्ता और महत्ता को किस प्रकार फुलझड़ी की तरह जलाने का कौतुक अपना लिया है, उससे प्रतीत होता है कि इस सुहावनी धरती पर रहते हुए भी हम सब प्रेत-पिशाचों की तरह एक दूसरे को काटने, गलाने, जलाने पर उतारू हैं। इसके प्रतिफल स्वरूप परस्पर सहयोग की बात बनना तो दूर, हम अविश्वास के ऐसे वातावरण में रह रहे हैं, जिससे अपनी छाया तक से डर लगता है।

🔵 विश्वास और विश्वासघात दोनों परस्पर हमजोली बनकर चल रहे हैं। असंयम के अतिवाद ने शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक दूरदर्शिता को मटियामेट करके रख दिया है। धन की इतनी बड़ी भूमिका बताई है कि उसे पाने के लिए कोई किसी के साथ कितनी ही बढ़ी-चढ़ी दुष्टता कर बैठे, तो उसे कम ही समझना चाहिए। ऐसे अभ्यस्त अनाचार के बीच कोई शरीर मस्तिष्क, परिवार, समाज, स्वयं समुन्नत रह सकेगा, इसकी आशा ही छोड़ देनी चाहिए, छूट भी गई है।      

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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