बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

👉 अपव्ययता किसी की भी न चली

🔴 हिंदी के अनन्य सेवक भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र विचारवान् थे, उसके कारण उन्हें सार्वजनिक प्रतिष्ठा और सम्मान भी मिला, धन भी बहुत कमाया, किंतु अपव्यय के एक दुर्गुण ने ही उनके जीवन को दुर्दशाग्रस्त बना दिया। घर आए धन की होली फूँकने, अंधाधुंध खर्च करने से तो महाराजे भी कंगाल हो जाते हैं। भारतेंदु बाबू उक्त कथन के प्रत्यक्ष उदाहरण है।

🔵 पैतृण संपत्ति के रूप में उन्हें धन की कमी पहले ही न थी। अपने साहित्यिक उपार्जन से भी उन्होंने अपना कोष बढा़या। वह सब धन किसी बैंक या पोस्ट आफिस में जमा कर देते तो उसके ब्याज में सारा जीवन हँसी-खुशी और मस्ती में बिता लेते, पर अपव्यय की बुरी लत ने उन्हें ऐसा पछाडा कि मरते समय उनके पास कानी कौडी़ शेष न थी।

🔴 भारतवर्ष एक निर्धन देश है यहाँ के नागरिकों को साधारण मोटा-नोटा खाना और कपडा प्रयोग करना चाहिए पर भारतेंदु बाबू बहुत कीमती कपडे पहनते, खाना इतना मसालेदार और स्वादिष्ट बनता कि कोई राजा-महाराजा भी वैसा क्या खाता होगा ? प्रतिदिन दिन में कई बार अंगराग और कीमती सुंगधित तेलो की मालिश कराते। भोजन, वस्त्र, फुलेल की इतनी मात्रा खरीदी जाती कि स्वयं के पास प्रतिदिन कई चाटुकार और झूठे प्रशंसक भी उनका उतना ही आनंद लूटते।

🔵 दीपक में फुलेल जलता, रोशनदानों के कपडे रोज बदले जाते। जूते तो धनी आदमी भी पांच-छह महीने पहन लेते है, पर भारतेंदु बाबू के लिये इतने दिनों के लिये ४-५ जोडी जूते-चप्पल भी कम रहते। आखिर धन की आय की भी मर्यादा है। उस सीमा के भीतर पांव न रखने से तो आर्थिक दुर्गति होती ही है।

🔴 जाडे की रात्रि थी। कुछ लोग बाहर से मिलने आए थे। झूठे दंभ के लिए अपने में बहुत बडा़- चडा़कर व्यक्त करने वालों के पीछे उचक्कों की कमी नहीं रहती। वे प्रायः झूंठी प्रशंसा करके अपना उल्लू सीधा करते है। वह सज्जन उसी में अपना गौरव मानते है। ऐसे समय थोडा भविष्य पर भी विचार कर लिया करें तो संभवत लोग परेशानियों से पहले ही बच लें।

🔵 भारतेंदु पढे-लिखे थे, पर दूरदर्शी नहीं। उन लोगो ने आते ही उनकी उदारता की झूठी प्रशंसा प्रारंभ कर दी। इधर हाथ सेंकने के लिये अँगीठी की आवश्यकता पडी़। अँगीठी इधर-उधर दिखाई न दी तो उसे और बढकर ढूँढना अपना अपमान जान पडा। शेखी में आकर जेब से नोट निकालकर उन्हीं में आग लगा दी और अपने हाथ सेंके। हम नही समझते दर्शकों पर इसका क्या प्रभाव पडा़ होगा ? भीतर-ही-भीतर ऐसी मूर्खता पर वे हँसे ही होंगे।

🔴 इस तरह की संगति और जीवन-क्रम के कारण उनमे चरित्र-दोष भी आ गए। हितैषियों ने समझाया-भैया हाथ रोककर खर्च किया करो, जुटाया नही जाता, न जाने आगे कैसी स्थिति आ जाए पर भारतेंदु जी की बुद्धि ने सही काम न किया।

🔵 अपव्यय के दुर्गुणों ने उन्हें शारीरिक और मानसिक दोनों दृष्टि से विक्षिप्त कर दिया। वे तीस बष की आयु में ही मर गये। जीवन के अंतिम दिनों मे उन्हें पैसे-पैसे के लिए दूसरे साथियों के आगे हाथ फैलाना पडा। ऐसे पत्र सुरक्षित हैं, जिनमे उन्होंने आर्थिक सहायता की याचना की है, पर यहाँ इस संसार में अपनी-अपनी आवश्यकताओं से ही सभी तंग है, दूसरों की कौन देखे ? कौन सहायता करे

🔴 मृत्यु के क्षणो में भारतेंदु बाबू ने कहा-'किसी के पास धन और साधन कितने ही बडे़ क्यो न हो, उनका खर्च और उपयोग बहुत हाथ साधकर सावधानी के साथ भविष्य की चिंता रखकर ही करना चाहिए।"  यह तब पहले समझ में आई होती तो यह दुर्दशा न होती।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 31, 32

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