बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 19)

🌹 उदारता अपनाई ही जाए  
🔵 शरीर कितना ही सुन्दर-सुसज्जित क्यों न हो, उसकी प्रतिष्ठा-उपयोगिता तभी है, जब उसमें जीवन चेतना विद्यमान हो। निष्प्राण हो जाने की स्थिति में तो, तथाकथित प्रेम प्रकट करने वाले भी उसे हटा देने का जुगाड़ बनाने में लग जाते हैं। सज्जनता की शोभा, उपयोगिता, आवश्यकता कितनी ही क्यों न हो, पर वह श्रेष्ठ स्तर की तभी मानी जायेगी, जब उसके साथ शालीनता की प्राणचेतना का सुनिश्चित समावेश हो।

🔴 सम्पत्ति से सुविधा साधन भर बढ़ या मिल सकते हैं किन्तु यदि उनका सदुपयोग न बन पड़े, तो वह दुधारी तलवार बन जाती है। वह रक्षा भी कर सकती है और अपनी तथा दूसरों की हत्या करने के काम भी आ सकती है। पिछले दिनों भूल यही होती रही है कि एक मात्र सम्पत्ति के ही गुण गाए जाते रहे। यहाँ तक समझा जाता रहा है कि उसके सहारे व्यक्ति की प्रतिभा-प्रतिष्ठा भी बढ़ सकती है। यह मान्यता ही आदि से अन्त तक भ्रान्तियों से भरी हुई है। यदि ऐसा ही रहा होता, तो धन सम्पन्नों के द्वारा लोकमंगल के श्रेष्ठ प्रयास बन पड़े होते और पिछड़ेपन का नाम निशान भी शेष कहीं न रहा होता। यदि सर्वसाधारण को पिछड़ेपन से अभावग्रस्तता से उबारने में सञ्चित सम्पदाओं को खर्च किया जा सका होता, तो संसार का नक्शा ही बदल गया होता।   

🔵 संसार में इतनी धन सम्पदा है कि उसे मिल-बाँटकर खाने पर सभी लोग सुख शान्ति से रह सकें और सन्तोषपूर्वक सर्वतोमुखी प्रगति का पथ प्रशस्त करते रहें। विलास, सञ्चय और अहंकार के प्रदर्शन में उसका उपयोग होने लगे, तो समझना चाहिए कि वह निरर्थक ही नहीं गई, वरन् उसने अनर्थ विनिर्मित करने के लिए अवाञ्छनीय वातावरण भी बनाकर रख दिया। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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