बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

👉 जीवन कैसे जीयें? (भाग 3)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 हम हिमालय के साथ जुड़ें, हम भगवान् के साथ जुड़ें तो हमारा भी सूखने का कभी मौका न आयेगा। फिर हम इतनी हिम्मत कर पायें तब। आप-हम भगवान् को समर्पित कर सकें अपने आपको तो भगवान् को हम पायें। हम भगवान् की कला का सारा लाभ उठा सकते हैं। शर्त ये है कि हम अपने आपको, अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को, अपनी कामनाओं को और अपनी विष-वृत्तियों को भगवान् के सुपुर्द कर दें। हम भगवान् के साथ में अपने आपको उसी तरीके से जोड़ें जैसे कठपुतली, जैसे पतंग और जैसे बाँसुरी। न कि हम इस तरीके से करें कि पग-पग पर हुकूमत चलायें। भगवान् के पास हम अपनी मनोकामना पेश करें। ये भक्ति की निशानी नहीं है।

🔵 भगवान् की आज्ञा पर चलना हमारा काम है। भगवान् पर हुकूमत करना और भगवान् के सामने तरह-तरह के फरमाइश पेश करना, ये सब वेश्यावृत्ति का काम है। हम में से किसी की उपासना लौकिक कामनाओं के लिये नहीं; बल्कि भगवान् की साझेदारी के लिये, भगवान् को स्मरण रखने के लिये, भगवान् का आज्ञानुवर्ती होने के लिये और भगवान् को अपना समर्पण करने के उद्देश्य से उपासना होनी चाहिए।

🔴 अगर आप ऐसी उपासना करेंगे तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि उपासना सफल होगी। आपको आंतरिक संतोष मिलेगा। न केवल आंतरिक संतोष मिलेगा;  पर आपके व्यक्तित्व का विकास होगा और व्यक्तित्व के विकास करने का निश्चित परिणाम ये है कि आदमी भौतिक और आत्मिक, दोनों तरीके की सफलताएँ भरपूर मात्रा में प्राप्त करता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/amart_vachan_jivan_ke_sidha_sutra/jivan_kese_jiye

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