बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 41) 2 Feb

🌹 साधना की पूर्णाहुति

🔴 इस प्रकार यज्ञ को कहीं भी अनावश्यक नहीं माना गया है, बल्कि उसे तो और भी आवश्यक अनिवार्य बताया गया है। अस्तु अभियान साधना में निरत साधकों को अपने अनुष्ठान की पूर्णाहुति यज्ञ से करना चाहिए और फिर अगला अनुष्ठान आरम्भ करना चाहिए। यज्ञ छोटा करना हो तो उसमें अपने परिवार के लोगों को सम्मिलित किया जा सकता है और एक कुण्ड का अग्निहोत्र किया जा सकता है। सब लोगों द्वारा मिलकर की गई 2400 आहुतियां देने से भी काम चल सकता है। बड़ा रूप देना हो तो पड़ोसी सम्बन्धी मित्रों को भी सम्मिलित करके पांच कुण्डी आयोजन का रूप दिया जा सकता है। उसे हवन में सम्मिलित आहुतियां पांच हजार भी हो सकती हैं। अलग से प्रबन्ध न करना हो तो किसी बड़े सामूहिक आयोजन में भी पूर्णाहुति का नारियल चढ़ाया जा सकता है।

🔵 वस्तुतः अभियान साधना एक प्रकार का अनुष्ठान ही है, जो एक वर्ष की अवधि में पूरा होता है। अवधि लम्बी होने से उसमें अनुशासन की सफलताएं रखी गई हैं। सामान्य साधक इसे बिना किसी कठिनाई के सरलता पूर्वक पूर्ण कर सकते हैं। पूर्णाहुति के अवसर पर ब्रह्मभोज के रूप में अर्थदान का भी माहात्म्य है। मात्र शारीरिक और मानसिक श्रम ही पर्याप्त नहीं, उसके साथ अर्थदान भी आवश्यक है। यज्ञ के रूप में कुछ पैसा खर्च होता है, कुछ ब्रह्मभोज के रूप में करना चाहिए। वर्तमान परिस्थितियों में ब्रह्मदान ही ब्रह्मभोज का विकल्प हो सकता है। ब्रह्मदान अर्थात् गायत्री साहित्य का सत्पात्रों को प्रचार के रूप में वितरण। इसके लिए कुछ राशि श्रद्धापूर्वक संकल्पित करनी चाहिए। प्रसाद वितरण में मिठाई बांटने की अपेक्षा ज्ञान सामग्री देने की व्यवस्था अधिक उपयुक्त है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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