बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 4)

🌹 गरीबों द्वारा अमीरों का आडम्बर
🔵 रोम के एक दार्शनिक के मन में भारत की महत्ता देखने की ललक उठी। समय और धन खर्च करके आए, घूमे और रहे। लौटे तो उदास थे। साथियों ने पूछा तो केवल इतना कहा ‘‘भारत में जहाँ गरीब अधिकांश रहते हैं, वहाँ भी अमीरों जैसा स्वाँग बनाया जाता है।’’ ऐसा ही कथन एक जापानी शिष्टमण्डल का भी है। उन्होंने भ्रमण के बाद कहा था। यहाँ अमीरी का माहौल है, परन्तु उसकी छाया में पिछड़े, गए-गुजरे लोग रहते हैं।

🔴 प्रश्न उठता है कि ऐसी विडम्बना क्यों कर बन पड़ी? अमीरों में जो दुर्गुण पाए जाते हैं, वे यहाँ जन-जन में विद्यमान हैं, किन्तु प्रगतिशीलों में जो सद्गुण पाए जाने चाहिए, उनका बुरी तरह अभाव है। इस कमी के रहते गरीबी ही नहीं, अशिक्षा, गन्दगी, कामचोरी जैसी अनेकों पिछड़ेपन की निशानियाँ बनी ही रहेंगी। वे किसी बाहरी सम्पत्ति के बलबूते दूर न हो सकेंगी। भूमि की अपनी उर्वरता न रहे, तो बीज बोने वाला सिंचाई-रखवाली करने वाला भी उपयुक्त परिणाम प्राप्त न कर सकेगा।

🔵 मनुष्य की वास्तविक सम्पदा उसका निजी व्यक्तित्व है। वह जीवन्त स्तर का हो, तो उसमें वह खेत-उद्यानों की तरह अपने को निहाल करने वाली और दूसरों का मन हुलसाने वाली सम्पदाएँ प्रचुर मात्रा में उत्पन्न हो सकती हैं, पर चट्टान पर हरियाली कैसे उगे? व्यक्तित्व अनायास ही नहीं बन जाता है। वह इर्द-गिर्द के वातावरण से अपने लिए प्राणवायु खींचता है। जहाँ विषाक्तता छाई हुई हो, वहाँ साँस लेना तक कठिन हो जायेगा। लम्बे समय तक जीवित रहने की बात तो वहाँ बन ही कैसे पड़ेगी?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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