गुरुवार, 5 जनवरी 2017

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 9) 6 Jan

🌹 प्रतिकूलताएं वस्तुतः विकास में सहायक

🔵 अपनी शारीरिक कुरूपता के कारण सैमुअल जॉनसन को किसी भी विद्यालय में नौकरी नहीं मिल सकी। बचपन से साथ चली आ रही घोर विपन्नता ने पल्ला नहीं छोड़ा। नौकरी की आशा छोड़कर वह अध्ययन में लगे रहे। मेहनत मजदूरी करके वे अपना गुजारा करते रहे। कुछ ही समय बाद उनकी साधना ने चमत्कार दिखाया और एक विद्वान साहित्यकार के रूप में इंग्लैण्ड में ख्याति मिली।

🔴 जॉनसन का अंग्रेजी विश्व कोष आज भी एक अनुपम कृति माना जाता है। ऑक्सफोर्ड विश्व विद्यालय ने उनकी सेवाओं के लिए उन्हें ‘डॉक्टर’ की उपाधि प्रदान की। ‘टाम काका की कुटिया’ की प्रसिद्ध लेखिका हैरियट स्टो को परिवार का खर्च चलाने के लिए कठिन श्रम करना पड़ता था गरीबी और कठिनाइयों के बीच घिरे रहकर भी उन्होंने थोड़ा-थोड़ा समय निकालकर पुस्तक पूरी की। अन्तःप्रेरणा से अभिप्रेरित होकर लिखी गयी उनकी यह पुस्तक अमेरिका में गुलामी प्रथा के अन्त के लिए एक वरदान साबित हुई।

🔵 ये उदाहरण इस तथ्य के प्रमाण हैं कि सफलता के लिए परिस्थितियों का उतना महत्व नहीं है जितना कि स्वयं की मनःस्थिति का। आशावादी दृष्टिकोण, संकल्पों के प्रति दृढ़ता और आत्मविश्वास बना रहे तदनुरूप प्रयास पुरुषार्थ चल पड़े तो अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति कर सकना हर किसी के लिए संभव है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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