गुरुवार, 5 जनवरी 2017

👉 सतयुग की वापसी (अन्तिम भाग) 6 Jan

🌹 दानव का नहीं देव का वरण करें  

🔴 दोष-घटनाओं को ही देखकर निश्चिंत नहीं हो जाना चाहिए। सोचना यह भी चाहिए कि यह अवांछनीयताओं का प्रवाह प्रचलन, जिस भावना क्षेत्र की विकृति के कारण उत्पन्न होता है, उस पर रोक थाम के लिए भी कुछ कारगर प्रयत्न किया जाए।           

🔵 संवेदनाओं में करुणा का समावेश होने पर दूसरे भी अपने जैसे दीखने लगते हैं। कोई समझदारी के रहते, अपनों पर आक्रमण नहीं करता, अपनी हानि सहन नहीं करता। इसी प्रकार यदि वह आत्मभाव समूचे समाज तक विस्तृत हो सके तो किसी को भी हानि पहुँचाने, सताने की बात सोचते ही हाथ-पैर काँपने लगेंगे। अपने आपे को दैत्य स्तर का निष्ठुर बनाने के लिए ऐसा कोई व्यक्ति तैयार न होगा, जिसकी छाती में हृदय नाम की कोई चीज है। जिसने अपनी क्रिया को, विचारणा को मात्र मशीन नहीं बनाया होता, वरन् उनके साथ उस आत्मसत्ता का भी समावेश किया होता; तो आत्मीयता करुणा, सहकारिता और सेवा-साधना के लिए निरन्तर आकुल-व्याकुल रहती।    

🔴 समस्याओं का तात्कालिक समाधान तो नशा पीकर बेसुध हो जाने पर भी हो सकता है। जब होश-हवास ही दुरुस्त नहीं, तो समस्या क्या? और उसका समाधान खोजने का क्या मतलब? पर जब मानवी गरिमा की गहराई तक उतरने की स्थिति बन पड़े तो फिर माता जैसा वात्सल्य हर आत्मा में उभर सकता है और हितसाधना के अतिरिक्त और कुछ सोचते बन ही नहीं पड़ता। तब उन उलझनों में से एक भी बच नहीं सकेगीं, जो आज हर किसी को उद्विग्न-आतंकित किए हुए हैं। 

🔵 प्रस्तुत पुस्तक को ज्यादा से ज्यादा प्रचार-प्रसार कर अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने एवं पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने का अनुरोध है।

🔴 १९८८-९० तक लिखी पुस्तकें (क्रान्तिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला) पू० गुरुदेव के जीवन का सार हैं- सारे जीवन का लेखा-जोखा हैं। १९४० से अब तक के साहित्य का सार हैं। इन्हें लागत मूल्य पर छपवाकर प्रचारित प्रसारित करने की सभी को छूट है। कोई कापीराइट नहीं है। प्रयुक्त आँकड़े उस समय के अनुसार है। इन्हें वर्तमान के अनुरूप संशोधित कर लेना चाहिए।   

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Awakening the Inner Strength

🔶 Human life is a turning point in the evolution of consciousness. One who loses this opportunity and does not attempt awakening his in...