शनिवार, 7 जनवरी 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 7 Jan 2017

🔴 यों युग शिल्पियों की संख्या एक लाख के लगभग है, पर उनमें एक ही कमी है, संकल्प में सुनिश्चितता का-दृढ़ता का-अनवरतता का अभाव। अभी उत्साह उभरा तो उछलकर आकाश चूमने लगे और दूसरे दिन ठंडे हुए तो झाग की तरह बैठ गये। इस अस्थिरता में लक्ष्यवेध नहीं हो सकता। उसके लिए अर्जुन जैसी तन्मयता होनी चाहिए जो मछली की आंख भर ही देखें। इसके लिए एकलव्य जैसी निष्ठा होनी चाहिए, जो मिट्टी के पुतले को निष्णात अध्यापक बना ले।

🔵 परिजनो! अपनी आज की मनोदशा पर हमें विचार करना ही है। अपनी अब तक की गतिविधियों पर हमें शान्त चित्त से ध्यान देना है। क्या हमारे कदम सही दिशा में चल रहे हैं? यदि नहीं, तो क्या यह उचित न होगा कि हम ठहरें, रुकें, सोचें और यदि रास्ता भूल गये हैं, तो पीछे लौटकर सही रास्ता पर चलें। इस विचार मन्थन की वेला में आज हमें यही करना चाहिए—यही सामयिक चेतावनी और विवेकपूर्ण दूरदर्शिता का तकाजा है।

🔴 उपदेश तो बहुत पा चुके हो, किन्तु उसके अनुसार क्या तुम कार्य करते हो? अपने चरित्र का संशोधन करने में अभी भी क्या किसी अन्य की राह देख रहे हो? तुम तो अब श्रेष्ठ कार्य करने की योग्यता प्राप्त करो। विवेक बुद्धि की किसी प्रकार अब उपेक्षा न करो। अपने चरित्र का संशोधन करने में लापरवाही करोगे या प्रयत्न में ढिलाई करोगे तो उन्नति कैसे हो सकती है? अपने शुभ अवसरों को न खोकर जीवन रणक्षेत्र में प्रबल पराक्रम से निरन्तर अग्रसर होकर विजयी प्राप्त करने के लिए सदैव तत्पर रहना सीखो।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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