शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

👉 जो दीपक की तरह जलने को तैयार हों (भाग 1)

🔴 महाप्रभु ईसा अपने शिष्यों से कहते थे- “तुम मुझे प्रभु कहते हो- मुझे प्यार करते हो, मुझे श्रेष्ठ मानते हो और मेरे लिए सब कुछ समर्पण करना चाहते हो। सो ठीक है। परमार्थ बुद्धि से जो कुछ भी किया जाता है, जिस किसी के लिए भी किया जाता है वह लौटकर उस करने वाले के पास ही पहुँचता है। तुम्हारी यह आकाँक्षा वस्तुतः अपने आपको प्यार करने, श्रेष्ठ मानने और आत्मा के सामने आत्म समर्पण करने के रूप में ही विकसित होगी। दर्पण में सुन्दर छवि देखने की प्रसन्नता- वस्तुतः अपनी ही सुसज्जा की अभिव्यक्ति है।

🔵 दूसरों के सामने अपनी श्रेष्ठता प्रकट करना उसी के लिए सम्भव है जो भीतर से श्रेष्ठ है। प्रभु की राह पर बढ़ाया गया हर कदम अपनी आत्मिक प्रगति के लिए किया गया प्रयास ही है। जो कुछ औरों के लिए किया जाता है वस्तुतः वह अपने लिए किया हुआ कर्म ही है। दूसरों के साथ अन्याय करना अपने साथ ही अन्याय करना है। हम अपने अतिरिक्त और कोई को नहीं ठग सकते। दूसरों के प्रति असज्जनता बरतकर अपने आपके साथ ही दुष्ट दुर्व्यवहार किया जाता है।”

🔴 “दूसरों को प्रसन्न करना अपने आपको प्रसन्न करने का ही क्रिया-कलाप है। गेंद को उछालना अपनी माँस-पेशियों को बलिष्ठ बनाने के अतिरिक्त और क्या है? गेंद को उछालकर हम उस पर कोई एहसान नहीं करते। इसके बिना उसका कुछ हर्ज नहीं होगा। यदि खेलना बन्द कर दिया जाये तो उन क्रीड़ा उपकरणों की क्या क्षति हो सकती है? अपने को ही बलिष्ठता के आनन्द से वंचित रहना पड़ेगा।”

🔵 “ईश्वर रूठा हुआ नहीं है कि उसे मनाने की मनुहार करनी पड़े। रूठा तो अपना स्वभाव और कर्म है। मनाना उसी को चाहिए। अपने आपसे ही प्रार्थना करें कि कुचाल छोड़े। मन को मना लिया- आत्मा को उठा लिया तो समझना चाहिए ईश्वर की प्रार्थना सफल हो गई और उसका अनुग्रह उपलब्ध हो गया।”

🌹 शेष कल
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति 1986 फरवरी पृष्ठ 2

👉 हीरों से भरा खेत

🔶 हफीज अफ्रीका का एक किसान था। वह अपनी जिंदगी से खुश और संतुष्ट था। हफीज खुश इसलिए था कि वह संतुष्ट था। वह संतुष्ट इसलिए था क्योंकि वह ...