गुरुवार, 19 जनवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 27)

🌞  हिमालय में प्रवेश

अपने और पराये


🔵 गंगानानी चट्टी से आगे जहां वर्षा के कारण बुरी तरह फिसलन हो रही थी। एक ओर पहाड़ दूसरी ओर गंगा का तंग रास्ता—उस कठिन समय में इस लाठी ने ही कदम कदम पर जीवन मृत्यु की पहेली को सुलझाया। उसने भी यदि जूतों की तरह साथ छोड़ दिया होता तो कौन जाने आज या पंक्तियां लिखने वाली कलम और उंगलियों का कहीं पता भी न होता।

🔴 बड़ी आशा के साथ लिए हुए जूते ने काट खाया। जिन पैरों पर बहुत भरोसा था उनने भी दांत दिखा दिए। पर वे पैसे की लाठी इतनी काम आई कि कृतज्ञता से इसका गुणानुवाद गाते रहने को जी चाहता है।

🔵 अपनों से आशा थी पर उनने साथ नहीं दिया। इस पर झुंझलाहट आ रही थी कि दूसरे ही क्षण पराई लगने वाली लाठी की वफादारी याद आ गई। चेहरा प्रसन्नता से खिल गया। जिनने अड़चन पैदा की उनकी बजाय उन्हीं का स्मरण क्यों न करूं जिसकी उदारता और सहायता के बल पर यहां तक आ पहुंचा हूं। अपने पराये की क्या सोचूं? इस ईश्वर की दृष्टि से सभी अपने, सभी पराये हैं।

🔴 आज रास्ते भर पहाड़ी जनता के कष्ट साध्य जीवन को अधिक ध्यान से देखता आया और अधिक विचार करता रहा। जहां पहाड़ों में थोड़ी-थोड़ी चार-चार छः-छः हाथ जमीन भी काम की मिली है। वहां उतने ही छोटे खेत बना लिए हैं। बैलों की गुजर वहां कहां? कुदाली से ही मिट्टी को खोद कर जुताई की आवश्यकता पूरी कर लेते हैं। जब फसल पकती है तो पीठ पर लाद कर इतनी ऊंचाई पर बसे हुए अपने घरों में पहुंचते हैं और वहीं उसे कूट-पीट कर अन्न निकालते हैं। जहां झरने का पानी नहीं वहां बहुत नीचे गहराई तक को पानी सिर और पीठ पर लाद कर ले जाते हैं। पुरुष तो नहीं जहां तहां दीखते हैं सारा कृषि कार्य स्त्रियां ही करती हैं। ऊंचे पहाड़ों पर से घास और लकड़ी काट कर लाने का काम भी वे ही करती हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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