बुधवार, 21 दिसंबर 2016

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 54)

🌹 कला और उसका सदुपयोग

🔴 78. सार्वजनिक उपयोग के उपकरण— अपनी समिति के पास कुछ ऐसे उपकरण रखे रहें जिन्हें लोग अक्सर दूसरों से मांग कर काम चलाया करते हैं। विवाह शादियों में काम आने वाले बड़े बर्तन, जलपात्र, फर्श, बिछौने, नसैनी, लालटेनें, सजावट का सामान, कुएं में गिरे हुए डोल रस्सी निकालने के कांटे, आटे की सेंमई बनाने की मशीनें जैसी छोटी-मोटी चीजें एकत्रित रखी जांय और उन्हें मरम्मत खर्च लेकर लोगों को देते रहा जाय तो उससे भी सहानुभूति एवं सद्भावना बढ़ती है।

🔵 79. जीव-दया के सत्कर्म— पशु-पक्षियों और जीव-जन्तुओं के प्रति करुणा उत्पन्न करने वाली प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। पशु-पक्षी भी अपने ही भाई-भतीजे हैं, उनका मांस खाने-खून पीने की आदत छुड़ानी चाहिए। उससे आध्यात्मिक सद्गुण नष्ट होते हैं, नृशंसता पनपती है। चमड़ा भी आजकल जीवित काटे हुए पशुओं का ही आ रहा है। उसका उपयोग करने से भी पशु-वध में वृद्धि होती है। हमें चमड़े के स्थान पर कपड़ा या रबड़ के जूते पहन कर काम चलाना चाहिए और दूसरी चमड़े की बनी वस्तुएं भी प्रयोग नहीं करनी चाहिए। मृगछालाएं भी आजकल हत्या किये हुए पशुओं की ही मिलती हैं, इसलिए पूजा में उनका प्रयोग नहीं करना चाहिए। जो रेशम कीड़ों को जिन्दा उबाल कर निकाला जाता है वह भी प्रयोग न किया जाय।

🔴 सामर्थ्य से अधिक काम लिया जाना, अधिक भार लादा जाना, बुरी तरह पीटना, घायल बीमारों से काम लेना, फूंका प्रथा के अनुसार दूध निकालना आदि अनेक प्रकार से पशुओं के साथ बरती जाने वाली नृशंसता का त्याग करना चाहिए।

🔵 गौ पालन, गौदुग्ध को प्राथमिकता देना जैसे धर्म कृत्यों की तरफ ध्यान देना चाहिए, जिससे स्वास्थ्य, समृद्धि और सद्भावना की अभिवृद्धि का मार्ग प्रशस्त हो सके।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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