बुधवार, 21 दिसंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (अन्तिम भाग) 22 Dec

🌹 गम्भीर न रहें, प्रसन्न रहना सीखें

🔵 एक शाम पंडित मोतीलाल नेहरू अपने पुत्र जवाहर लाल के साथ गांधीजी से मिलने साबरमती आश्रम पहुंचे। झोंपड़ी में मिट्टी का दीप जल रहा था और दरवाजे के बाहर लाठी रखी हुई थी। हवा जवाहरलाल से कुछ मजाक करने पर तुली थी, उसने झोंके से दीपक बुझा दिया। अंधेरे में जवाहरलाल लाठी से जा टकराये, उनके घुटने को चोट लगी—वैसे ही जवाहरलाल गर्म मिजाज थे, इस चोट ने उनमें झल्लाहट भर दी। वे गांधी जी से पूछ बैठे—‘बापू आप मुंह से अहिंसा की दुहाई देते हैं और लाठी हाथ में लेकर चलते हैं, आप ऐसा क्यों करते हैं?’ गांधीजी ने हंसकर कहा—‘तुम जैसे शैतान लड़कों को ठीक करने के लिये।’

🔴 गांधीजी दूसरे गोल मेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए इंग्लैंड गये। वहां के लोग नहीं माने, उन्हें बालरूम डांस दिखने ले गये। वहां सब अपने-अपने जोड़ों के साथ नाचने लगे। एक अंग्रेज ने उनसे कहा—‘आप भी अपना पार्टनर चुन लीजिए।’

🔵 गांधीजी ने अपनी लाठी दिखाकर कहा—‘मेरे साथ मेरा पार्टनर है।’ यह सुनकर सबको हंसी आ गई।

🔴 एक दिन की बात है। सेठ जमनालाल बजाज ने गांधीजी से कहा—‘बापू! यह तो मुझे ज्ञात है कि आपका मुझ पर अपार स्नेह है किन्तु मैं चाहता हूं कि आप मुझे देवीदास की तरह ही अपना पुत्र बना लें।’

🔵 उनका अभिप्राय गोद लेने से था। यह जानकर गांधीजी ने लम्बे-चौड़े बजाज जी की ओर देखकर कहा—‘कहते हो सो तो ठीक है। बाप बेटे को गोद लेता है, पर यहां तो स्थिति उल्टी है। बेटा बाप को गोद लेने जैसा दीखता है।’

🔴 विनोद प्रियता की प्रवृत्ति को जरा हम भी अपना स्वभाव का अंग बनाकर देखें, विषाद कभी हमारे निकट आ ही नहीं सकता।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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