बुधवार, 21 दिसंबर 2016

👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 22)

🌹 अपनी दुनियाँ के स्वयं निर्माता
🔵 दुनियाँ वाले बहुत खराब हैं, पर उसमें खराबी से कहीं ज्यादा अच्छाई मौजूद है। हमें उस अच्छाई पर ही अपनी दृष्टि रखनी चाहिए, अच्छाई से ही आनन्द लेना चाहिए और अच्छाई को ही आगे बढ़ाना चाहिए। दिन में हम जगते हैं, प्रकाश में काम करते हैं, उजाले में रहना पसंद करते हैं। जब रात का अंधेरा सामने आता है, तो आँखें बंद करके सो जाते हैं, जिन्हें रात में भी काम करना है, वे दीपक जला लेते हैं। हमारी यह उजाले में काम करने, अंधेरे में सो जाने की प्रवृत्ति यह सिखाती है कि संसार के साथ किस तरह व्यवहार करना चाहिए। किसी आदमी में क्या सद्गुण है, उसे खोज निकालिए और उन्हीं से सम्पर्क रखिए, उन्हीं में आनंद लीजिए, उन्हें ही प्रोसाहित कीजिए, जो दोष हों उन्हें भी देखिए तो सही, पर उनमें उलझिए मत। रात की तरह आँख बंद कर लीजिए।
 
🔴 महर्षि दत्तात्रेय की कथा जानने वालों को विदित होगा कि जब तक वे दुनियाँ के काले और सफेद दोनों पहलुओं का समन्वय करते रहे, तब तक बड़े चिंतित और दुःखी रहे। जब उन्होंने कालेपन से दृष्टि हटा ली और सफेदी पर ध्यान दिया, तो उन्हें सभी जीव आदनीय, उपदेश देने वाले और पवित्र दिखाई पड़े, उन्होंने चौबीस गुरु बनाए, जिनमें कुत्ता, बिल्ली, सियार, मकड़ी, मक्खी, चील, कौए जैसे जीव भी थे। उन्हें प्रतीत हुआ कि कोई भी प्राणी घृणित नहीं। सबके अंदर महान् आत्मा है और वे महानता के लिए आगे बढ़ रहे हैं, जब हम अपनी दृष्टि को गुण ग्राहक बना लेते हैं तो दुनियाँ का सारा तख्ता पलट जाता है, दोष के स्थान पर गुण, बुराई के स्थान पर भलाई, दुःख के स्थान पर सुख आ बैठता है। बहुत बुरी दुनियाँ, बहुत अच्छी बन जाती है।

🔵 तिल की ओट ताड़ छिपा हुआ है। भूल-भुलैया के खेल में चोर दरवाजा जरा सी गलती के कारण छू जाता है। बाजीगर एक पोली लकड़ी रखता है, उसमें एक तरफ डोरा पीला होता है दूसरी तरफ नीला। इस छेद में से डोरा खींचता है, तो पीला निकलता है और उधर से खींचने पर वह नीला हो जाता है। लोग अचंभा करते हैं कि डोरा किस तरह रंग बदलता है, पर उस लकड़ी के पोले भाग में डोरे का एक भाग उलझा रहने के कारण यह अदल-बदल होती रहती है। संसार किसी को बुरा दीखता है, किसी को भला, इसका कारण हमारी दृष्टि की भीतरी उलझन है। इस उलझन का रहस्य भरा सुलझाव यह है कि आप अपना दृष्टिकोण बदल डालिए। अपने पुराने कल्पना जंजालों को तोड़-फोड़ कर फेंक दीजिए। तरह-तरह के उलझनों भरे जाल जो मस्तिष्क में बुन गए हैं, उन्हें उखाड़ कर एक कोने में मत डाल दीजिए। अपना तीसरा नेत्र, ज्ञान नेत्र खोलकर पुरानी दुनियाँ को नष्ट कर डालिए। वर्तमान कलियुग को प्रलय के गर्त में गिर पड़ने दीजिए और अपना सतयुग अपने मानस लोक में स्वयं रच डालिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/aapni.2

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