मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 52)

🌹 कला और उसका सदुपयोग

🔴 75. नाटक और एकांकी— सामूहिक खुले लीला अभिनयों की भांति ही उनका सुधरा और अधिक सुन्दर रूप नाटक मण्डलियों के रूप में बनता है। रासलीलाओं का वर्तमान रूप वैसा ही है। बड़ी नाटक मण्डलियों की बात यहां नहीं की जा रही है। थोड़े से उपकरणों का रंगमंच बनाकर अनेक महापुरुषों के जीवनों की श्रेष्ठ घटनाओं, ऐतिहासिक तथ्यों तथा सामाजिक स्थिति का चित्रण करने वाले नाटकों की व्यवस्था करके उन्हें साधारण जनता के मनोरंजन का माध्यम बनाया जा सकता है। ऐसी मण्डलियां व्यवसायिक आधार पर गठित हो सकती हैं। जन स्थिति के अनुरूप खर्च वसूल करके उन्हें सस्ता और लोक प्रिय बनाया जा सकता है।

🔵 छोटे-मोटे आयोजनों में एकांकी अभिनय भी बड़े रोचक और मनोरंजक होते हैं। विद्यालयों में एकांकी अभिनय बड़े सफल होते हैं, उन्हें दूसरे आयोजनों पर भी प्रदर्शित किया जा सकता है। ऐसे एकांकी एवं नाटक लिखे और प्रदर्शित किए जाने चाहिए जो नैतिक एवं विचार क्रान्ति में आवश्यक योगदान दे सकें।

🔴 76. कला के वैज्ञानिक माध्यम— विज्ञान के माध्यम से कुछ कलात्मक माध्यमों का इतना विकास हो गया है कि उनका उपयोग तो जनता करती है पर निर्माण ऊंचे स्तर पर ही हो सकता है। ग्रामोफोन के रिकार्ड और सिनेमा फिल्में इसी प्रकार के दो माध्यम हैं, जिनने जनमानस पर भारी प्रभाव डाला है। ग्रामोफोन का प्रचलन तो रेडियो के विस्तार से घट गया है, पर उत्सवों के अवसरों पर लाउडस्पीकरों द्वारा रिकार्ड अभी भी बजाये जाते हैं और उन्हें लाखों व्यक्ति प्रतिदिन सुनते हैं। इसी प्रकार देश भर में हजारों सिनेमा-घर हैं, जिनमें लाखों फिल्में चल जाती हैं। इन्हें भी करोड़ों व्यक्ति हर साल देखते हैं और जैसे भी संस्कार उन दृश्यों में होते हैं उन्हें देखने वाले ग्रहण करते हैं। मानवीय मस्तिष्क को प्रभावित करने के लिए विज्ञान की यह दो बड़ी कलात्मक देन हैं। पर खेद इसी बात का है कि इनका दुरुपयोग ही अधिक होता है। यदि इनका सदुपयोग हो सका होता तो जन-जागृति एवं चरित्र-निर्माण में भारी योग मिला होता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आदेश की विचित्र पालना, एक उलझन मे एक सुलझन मे

🔷 एक बार एक महात्मा जी के दरबार मे एक राहगीर आया और उसने पुछा की हॆ महात्मन सद्गुरु की आज्ञा का पालन कैसे करना चाहिये? 🔶 महात्मा जी ने...