मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 41) 20 Dec

🌹 गम्भीर न रहें, प्रसन्न रहना सीखें

🔵 महात्मा गांधी कहा करते थे—‘यदि कोई मुझसे विनोद प्रियता छीन ले तो मैं उसी दिन पागल हो जाऊंगा।’ मुस्कान तथा आह्लाद थकान की दवा है विनोद इनका जनक है। विनोद प्रियता अधिकांश महापुरुषों का गुण रही है। गांधीजी के जीवन का तो यह अनिवार्य पहलू था।

🔴 कलकत्ता में गांधीजी ने खादी प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए कहा—‘आज जो भी खादी खरीदेगा उसका कैशमीमो मैं बनाऊंगा।’ देखते ही देखते खरीददारों की भीड़ एकत्रित हो गई। थोड़ी सी देर में ढाई हजार रुपये की खादी बिक गई।

🔵 आचार्य कृपलानी ने यह चमत्कार देखा तो मजाक में कह उठे—‘लेना-देना कुछ नहीं बनिये ने ढाई हजार रुपये मार लिये।’ गांधीजी कब पीछे रहने वाले थे, चट बोल पड़े—‘यह काम मेरे जैसे बनिये ही कर सकते हैं, प्रोफेसर नहीं।’

🔴 9 अगस्त सन् 1942, प्रातःकाल पुलिस कमिश्नर गांधीजी को गिरफ्तार करने पहुंचा, उन्हें ले जाते हुए पुलिस कमिश्नर ने पास खड़े घनश्यामदास बिड़ला से कहा—‘गांधीजी के लिए आधा सेर बकरी का दूध दिलवा दीजिये।’

🔵 बिड़लाजी ने बापू से पूछा—‘ये लोग आपकी बकरी का दूध मांगते हैं।’ उन्होंने हंसते हुए कहा—‘चार आने धरा लो और दूध दे दो।’

🔴 एक बार एक अंग्रेज पत्रकार ने गांधीजी से पूछा—‘आप देश के महान नेता होकर भी हमेशा रेल के तीसरे दर्जे में ही सफर क्यों करते हैं?’

🔵 बापू ने उसी क्षण उत्तर दिया—‘इसलिए कि रेल में कोई चौथा दरजा नहीं है।’ पत्रकार यह उत्तर सुनकर सकपका गया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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