गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 2) 30 Dec

🌹 प्रतिकूलताएं वस्तुतः विकास में सहायक

🔵 बहुत समय पूर्व ग्रीस में गुलाम प्रथा का आतंक चरम सीमा पर था। गुलामों की खराद बिक्री का कार्य पशुओं की भांति चलता था। उनके साथ व्यवहार भी जानवरों की भांति होता था। गुलामों के विकास शिक्षा स्वास्थ्य की बातों पर ध्यान देने की तोबात ही दूर थी, यदि कोई गुलाम पढ़ने लिखने की बात सोचता था तो इसे अपराध माना जाता था। ऐसी ही विषम प्रतिकूल एवं आतंक भरी परिस्थितियों में एक गुलाम के घर जन्मे एक किशोर के मन में ललित कला सीखने की उत्कट इच्छा जागृत हुई। ग्रीस में यह कानून बन चुका था कि कोई भी गुलाम स्वाधीन व्यक्ति की भांति ललित कलाओं का अध्ययन नहीं कर सकता था। जबकि स्वाधीनों को हर प्रकार की सुविधा थी और उन पर किसी प्रकार की रोक-टोक न थी।

🔴  ‘क्रियो’ का किशोर हृदय इस स्थिति को देखकर रोता रहता था। डर था कि उसकी कलाकृति पकड़ी गई तो कठोर दण्ड मिलेगा। सहयोगी के नाम पर एकमात्र उसकी बहिन उसे निरन्तर प्रोत्साहित किया करती थी और कहती थी— ‘‘भैया डरने की आवश्यकता नहीं तुम्हारी कला में शक्ति होगी तो स्थिति अवश्य बदलेगी, तुम अपनी आराधना में लगे भर रहो।’’ बहिन की प्रेरणा उसमें समय-समय पर शक्ति संचार करती थी। कला देवता की आराधना के लिए बहिन ने अपने टूटे-फूटे मकान के नीचे तहखाने में भाई के लिए सारी आवश्यक वस्तुयें जुटा दीं। भोजन शयन की व्यवस्था भी उसके लिए तहखाने में ही थीं। क्रियो ने अपनी समूची कलाकृति संगमरमर की एक मूर्ति बनाने में झोंक दी।

🔵 उन्हीं दिनों ग्रीस के एथेन्स नगर में विशाल कला प्रदर्शनी आयोजित हुई। पेरी क्लाज नामक विद्वान प्रदर्शनी के अध्यक्ष नियुक्त किये गये। एस्पेसिया, फीडीयस, दार्शनिक सुकरात, साफोक्लीज जैसे विद्वान भी कला की प्रदर्शनी में आमन्त्रित थे। ग्रीस के सभी प्रख्यात कलाकारों की कलाकृतियां वहां आयी थीं। एक-एक करके सभी कलाकृतियों के ऊपर से चादर हटा दी गई। दर्शकों को ऐसा लगा जैसे मानो ललित कलाओं के देवता अपोलो ने अपने हाथों मूर्ति को गढ़ा हो। उसको बनाने वाला कौन है, सभी का एक ही प्रश्न था? कोई उत्तर न मिला।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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