गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 59)

🌹 राजनीति और सच्चरित्रता

🔴 88. मत-दान और मतदाता— जहां प्रजातन्त्र पद्धति है वहां शासन के भले या बुरे होने का उत्तर-दायित्व वहां के उन सभी नागरिकों पर रहता है जो मतदान करते हैं। ‘वोट’ राष्ट्र की एक परम पवित्र थाती है। उसकी महत्ता हम में से हर को समझनी चाहिये। किसी पक्षपात, दबाव या लोभ में आकर इसे चाहे किसी को दे डालने का उथलापन नहीं अपनाना चाहिए। जिस पार्टी या उम्मीदवार को वोट देना हो उसकी विचारधारा, भावना एवं उत्कृष्टता को भली भांति परखना चाहिए। राष्ट्र के भाग्य निर्माण का उत्तरदायित्व हम किसे सौंपे? इस कसौटी पर जो भी खरा उतरे उसे ही वोट दिया जाय। प्रजातन्त्र का लाभ तभी है जब हर नागरिक उसका महत्व और उत्तरदायित्व समझे और अनुभव करे। शासन में आवश्यक सुधार अभीष्ट हो तो इसके लिये मतदाताओं को समझाया और सुधारा जाना आवश्यक है।

🔵 89. शिक्षा पद्धति का स्तर— शिक्षालय व्यक्तित्व ढालने की फैक्ट्रियां होती हैं। वहां जैसा वातावरण रहता है, जिस व्यक्तित्व के अध्यापक रहते हैं, जैसा पाठ्यक्रम रहता है, जैसी व्यवस्था बरती जाती है उसका भारी प्रभाव छात्रों की मनोभूमि पर पड़ता है और वे भावी जीवन में बहुत कुछ उसी ढांचे में ढल जाते हैं। आज शिक्षा का पूरा नियन्त्रण सरकार के हाथ में है, इसलिए छात्रों की मनोभूमि का निर्माण करने की जिम्मेदारी भी बहुत कुछ उसी के ऊपर है। शिक्षण पद्धति में ऐसा सुधार करने के लिए सरकार को कहा जाय जिससे चरित्रवान् कर्मठ और सभ्य, सेवा भावी नागरिक बनकर शिक्षार्थी निकल सकें। सैनिक शिक्षा को शिक्षण का अनिवार्य अंग बनाया जाय और नैतिक एवं सांस्कृतिक भावनाओं से विद्यालयों का वातावरण पूर्ण रहे। इसके लिये सरकार पर आवश्यक दबाव डाला जाय।

🔴 90. कुरीतियों का उन्मूलन—
सामाजिक कुरीतियों की हानियां नैतिक अपराधों में बढ़कर हैं। भले ही उन्हें मानसिक दुर्बलतावश अपनाये रखा गया हो पर समाज का अहित तो बहुत भारी ही होता है। इसलिये इनके विरुद्ध भी कानून बनाने चाहिए। स्वर्ण नियन्त्रण का कानून कड़ाई के साथ अमल में आते ही जेवरों का सदियों पुराना मोह सप्ताहों के भीतर समाप्त हो गया। इसी प्रकार सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध अन्य कानून भी बनाये जांय और उनके पालन कराने में स्वर्ण नियन्त्रण जैसी कड़ाई बरती जाय। यों दहेज, मृत्युभोज, बाल-विवाह, वेश्यावृत्ति आदि के विरुद्ध कानून मौजूद हैं पर वे इतने ढीले-पोले हैं कि उससे न्याय और कानून का उपहास ही बनता है। यदि सचमुच ही कोई सुधार करना हो तो कानूनों में तेजी और कड़ाई रहनी आवश्यक है। सरकार पर ऐसे सुधारात्मक कड़े कानून बनाने के लिए जोर डाला जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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