मंगलवार, 29 नवंबर 2016

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 44)

🌞  चौथा अध्याय

🔴  मन के तीनों अंग-प्रवृत्त मानस, प्रबुद्घ मानस, आध्यात्मिक मानस भी अपने स्वतंत्र प्रवाह रखते हैं अर्थात् यों समझना चाहिए कि
'नित्यः सर्वगतः स्थाणु रचलोऽयं सनातनः।' आत्मा को छोड़कर शेष सम्पूर्ण शारीरिक और मानसिक परमाणु गतिशील हैं। यह सब वस्तुएँ एक स्थान से दूसरे स्थानों को चलती रहती हैं। जिस प्रकार शरीर के पुराने तत्त्व आगे बढ़ते और नये आते रहते हैं, उसी प्रकार मानसिक पदार्थों के बारे में भी समझना चाहिए। उस दिन आपका निश्वय था कि आजीवन ब्रह्राचारी रहूँगा, आज विषय भोगों से नहीं अघाते। उस दिन निश्चय था अमुक व्यक्ति की जान लेकर अपना बदला चुकाऊँगा, आज उनके मित्र बने हुए हैं। उस दिन रो रहे थे कि किसी भी प्रकार धन कमाना चाहिए, आज सब कुछ त्याग कर सन्यासी हो रहे हैं। ऐसे असंख्य परिवर्तन होते रहते हैं। क्यों? इसलिए कि पुराने विचार चले गये और नये उनके स्थान पर आ गए।

🔵  विश्व की दृश्य-अदृश्य सभी वस्तुओं की गतिशीलता की धारणा, अनुभूति और निष्ठा यह विश्वास करा सकती है कि सम्पूर्ण संसार एक है। एकता के आधार पर उसका निर्माण है। मेरी अपनी वस्तु कुछ भी नहीं है या सम्पूर्ण वस्तुएँ मेरी हैं। तेज बहती हुई नदी के बीच धार में तुम्हें खड़ा कर दिया जाए और पूछा जाए कि पानी के कितने और कौन से परमाणु तुम्हारे हैं, तब क्या उत्तर दोगे? विचार करोगे कि पानी की धारा बराबर बह रही है। पानी के जो परमाणु इस समय मेरे शरीर को छू रहे हैं, पलक मारते-मारते बहुत दूर निकल जायेंगे। जल-धारा बराबर मुझसे छूकर चलती जा रही है, तब या तो सम्पूर्ण जल धारा को अपनी बनाऊँ या यह कहूँ कि मेरा कुछ भी नहीं है, यह विचार कर सकते हो।

🔴  संसार जीवन और शक्ति का समुद्र है। जीव इसमें होकर अपने विकास के लिए आगे को बढ़ता जाता है और अपनी आवश्यकतानुसार वस्तुएँ लेता और छोड़ता जाता है। प्रकृति मृतक नहीं है। जिसे हम भौतिक पदार्थ कहते हैं, उसके समस्त परमाणु जीवित हैं। वे सब शक्ति से उत्तेजित होकर लहलहा, चल, सोच और जी रहे हैं। इसी जीवित समुद्र की सत्ता के कारण हम सबकी गतिविधि चल रही है। एक ही तालाब की हम सब मछलियाँ हैं। विश्व व्यापी शक्ति, चेतना और जीवन के परमाणु विभिन्न अभिमानियों को झंकृत कर रहे हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/mai_kya_hun/part4

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