मंगलवार, 29 नवंबर 2016

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 32)

🌹 सभ्य समाज की स्वस्थ रचना

🔵 43. सत्प्रवृत्ति का अभ्यास— परिवारों में पारस्परिक सहयोग, सभी का परिश्रमी होना, टूटी, पुरानी वस्तुओं की मरम्मत और सदुपयोग, कोने-कोने में सफाई, वस्त्रों के धोने का काम अधिकांश घर में होना, सभी सदस्यों का नियमित व्यायाम, घरेलू झगड़ों को सुलझाने की व्यवस्था, शिक्षा में सभी की अभिरुचि, स्वावलम्बन और बौद्धिक विकास के लिए सतत् प्रयत्न, मितव्ययिता और सादगी, कपड़ों की सिलाई आदि गृहउद्योगों का सूत्रपात, लोक हित के लिए नित्य नियमित दान जैसे अनेक कार्यक्रम घर की प्रयोगशाला में चलाये जा सकते हैं। यही प्रशिक्षण बड़े रूप से विकसित हों तो सारा समाज सभ्य और सुसंस्कृत बन सकता है।

🔴 44. सन्तान और उसकी जिम्मेदारी— नई पीढ़ी का निर्माण एक परम पवित्र और समाज सेवा का श्रेष्ठ साधन माना जाय। सन्तानोत्पादन को विलास का नहीं, राष्ट्रीय कर्तव्य की पूर्ति का एक देशभक्ति पूर्ण कार्य माना जाय। इसके लिए माता-पिता अपनी शारीरिक, मानसिक और आर्थिक तैयारी बहुत पहले से ही आरम्भ करें। जो गुण-दोष माता-पिता में होते हैं वही सन्तान में आते हैं, इसलिए पति-पत्नी अपने सद्गुणों को ऊंची से ऊंची स्थिति तक चढ़ावें और अत्यन्त प्रेम एवं आत्मीयता से रहें। इसी एकता की उत्कृष्टता पर बालक का आन्तरिक विकास निर्भर रहता है।

🔵 परस्पर द्वेष अविश्वास एवं कलह रखने वाले माता-पिता दुष्टात्मा सन्तान को ही जन्म देते हैं। गर्भावस्था में माता की भावनाएं जिस प्रकार की रहती हैं वे ही संस्कार बच्चे में आते हैं। बालकों की शिक्षा माता के गर्भ-काल से तो आरम्भ हो ही जाती है, वस्तुतः वह इससे भी बहुत पहले होता है। माता-पिता के गुण, कर्म, स्वभाव, स्वास्थ्य, मनोभाव बौद्धिक स्तर का प्रभाव बालकों पर आता है। इसलिए सभ्य पीढ़ी उत्पन्न करने की क्षमता विचारशील पति-पत्नी को वैवाहिक जीवन के आरंभ से ही प्राप्त करने में लग जाना चाहिए। अधिक ब्रह्मचर्य से रहना चाहिए और दाम्पत्य जीवन को प्रत्येक दृष्टि से आदर्श बनाना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

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