मंगलवार, 29 नवंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 19) 30 Nov

🌹 *गृहस्थ धर्म तुच्छ नहीं है*
🔵  दार्शनिक लेटो ने कहा है— ‘‘सृष्टि आदि में मनुष्य अपंग था, वह पृथ्वी एक कोने में पड़ा खिसक रहा था। स्त्री ने ही उसे उठाया और पाल कर बड़ा किया। आज वही कृतघ्न उन स्त्रियों को पैरों की जूती समझता है।’’ कवि हारग्रच की अनुभूति है कि— ‘‘स्त्रियां भूलोक की कविता हैं। पुरुष के भाग्य का निस्तार उन्हीं के हाथों में है।’’ कार्लाइल कहा करते थे— ‘‘यदि तुम प्रेम के साक्षात दर्शन करना चाहते हो तो माता के गदगद नेत्रों को देखो।’’ सृष्टि के आरंभ काल का दिग्दर्शन करते हुए सन्त केलवैल ने कहा कि— ‘‘जब तक आदम अकेला है तब तक उसे स्वर्ग भी कण्टकाकीर्ण था। देवताओं के गीत, शीतल समीर और ललित वाटिकायें उसके लिये सभी व्यर्थ थीं, यह सब होते हुए भी वह उदास रहता था और आहें भरता था, परन्तु जब उसे हवा मिल गई तो सारा दुख दूर हो गया। कांटे फूलों में बदल गये।’’

🔴  जिन सन्तों ने अपने पवित्र नेत्रों से नारी को देखा है उन्हें उसमें ईश्वर की सजीव कविता मूर्तिमान दिखाई दी है। जिनकी आंखों में पाप है उनके लिये बहिन, बेटी और माता की समीपता में ही नहीं, प्रत्येक जड़ चेतन की समीपता में खतरा है। जिनके अंचल में आग बंधी हुई है उसके लिये सर्वत्र अग्निकाण्ड का खतरा है, जिसकी आंखों पर हरा ठंडा चश्मा है उसके लिए कड़ी धूप भी शीतल है। पाठको! अपना दृष्टिकोण पवित्र बनाओ। विश्वास रखो, राजा जनक की भांति आप भी गृहस्थ में रहते हुए सच्चे महात्मा बन सकते हैं।

🌹  क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
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👉 Awakening the Inner Strength

🔶 Human life is a turning point in the evolution of consciousness. One who loses this opportunity and does not attempt awakening his in...