शनिवार, 11 सितंबर 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ६१)

तत्वदर्शन से आनन्द और मोक्ष

पेंगल तब महर्षि नहीं बने थे। उसके लिए आत्म-सिद्धि आवश्यक थी। पर पेंगल साधना करते-करते पदार्थों की विविधता में ही उलझ कर रह गये। पशु-पक्षी, अन्य जन्तु, मछलियां, सांप, कीड़े मकोड़ों में शरीरों और प्रवृत्तियों की भिन्नता होने पर भी शुद्ध अहंकार और चेतना की एकता तो समझ में आ गई पर विस्तृत पहाड़, टीले, जंगल, नदी, नाले, समुद्र, सूर्य, चन्द्रमा, तारे, प्रकाश और पृथ्वी पर पाये जाने वाले विविध खनिज, धातुयें, गैसें, ठोस आदि क्या हैं, क्यों हैं, और उनमें यह विविधता कहां से आई है—यह उनकी समझ में नहीं आया। इससे उनकी आत्म-दर्शन की आकांक्षा और बेचैन हो उठी।

ये याज्ञवल्क्य के पास गये और उसकी बाहर वर्ष तक सेवा सुश्रुषा कर पदार्थ-विद्या का ज्ञान प्राप्त किया। इस अध्ययन से पेंगल का मस्तिष्क साफ हो गया कि जड़ पदार्थ भी एक ही मूल सत्ता के अंश हैं। सब कुछ एक ही तत्व से उपजा है। ‘एकोऽहं बहुस्यामः’, ‘एक नूर से सब जग उपजिआ’ वाली बात उन्हें पदार्थ विषम में भी अक्षरशः सत्य प्रतीत हुई। पेंगलोपनिषद् में इस कैवल्य का उपदेश मुनि याज्ञवलक्य ने इस प्रकार दिया है—

‘‘सदैव सोग्रयदमग्र आसीत् । तन्नित्यनुक्तमविक्रियं सत्य ज्ञानानन्द परिपूर्ण सनातनमेकवातीयं ब्रह्म ।। तस्मिन् मरुशुक्तिमस्थाणुस्फाटि कादो जल रौप्य पुरुष रेखाऽऽदिशल्लोहित शुक्ल कृष्ण गुणमयी गुण साम्या निर्वाच्या मूलप्रकृतिरासीत् । तत्प्रतिबिम्बितं यत्तद् साक्षि चैतन्यमासीत् ।।—’’
—पैंगलोपनिषद् 1।2-3

हे पैंगल! पहले केवल एक ही तत्व था। वह नित्य मुक्त, अविकारी, ज्ञानरूप चैतन्य और आनन्द से परिपूर्ण था, वही ब्रह्म है। उससे लाल, श्वेत, कृष्ण वर्ण की तीन प्रकाश किरणों या गुण वाली प्रकृति उत्पन्न हुई। यह ऐसा था जैसे सीपी में मोती, स्थाणु में पुरुष और मणि में रेखायें होती हैं। तीन गुणों से बना हुआ साक्षी भी चैतन्य हुआ। वह मूल प्रकृति फिर विकारयुक्त हुई तब वह सत्व गुण वाली आवरण शक्ति हुई, जिसे अवयक्त कहते हैं।.....उसी में समस्त विश्व लपेटे हुए वस्त्र के समान रहता है। ईश्वर में अधिष्ठित आवरण शक्ति से रजोगुणमयी विक्षेप शक्ति होती है, जिसे महत् कहते हैं। उसका जो प्रतिबिम्ब पड़ता है वह चैतन्य हिरण्य गर्भ कहा जाता है। वह महत्तत्व वाला कुछ स्पष्ट और कुछ अस्पष्ट आकार का होता है.....।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ९९
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

कोई टिप्पणी नहीं:

👉 जीवन लक्ष्य और उसकी प्राप्ति भाग ३

👉 *जीवन का लक्ष्य भी निर्धारित करें * 🔹 जीवन-यापन और जीवन-लक्ष्य दो भिन्न बातें हैं। प्रायः सामान्य लोगों का लक्ष्य जीवन यापन ही रहता है। ...