शनिवार, 11 सितंबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ६१)

समस्त साधनाओं का सुफल है भक्ति

ब्रह्मर्षि वशिष्ठ की वाणी पर्वतीय प्रपात की भांति थी, जिससे अमृत झर-झर बह रहा था। इस अमृत प्रवाह से सभी के मन-अन्तःकरण भीगते रहे, हृदय सिंचित होते रहे। सभी ने अनोखी अनुभूति पायी। ऐसी तृप्ति किसी को कभी न मिली थी, जैसी कि वे सब आज अनुभव कर रहे थे। इन अनुभूति में देवों, ऋषियों, सिद्धों एवं दिव्य देही आत्माओं का वह समुदाय पता नहीं कब तक खोया रहता, लेकिन तभी गगन में महासूर्य के समान प्रचण्ड ज्योतिर्मय पुञ्ज का उदय हुआ। इसे देखकर अनेकों मुखों पर आश्चर्य की रेखाएँ गहरी हुईं, परन्तु ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के अधरों पर स्मित रेखा झलकी और वह हल्के से मुस्करा दिए।
    
जो आश्चर्यचकित थे वे यह सोच रहे थे कि इस अरुणोदय काल में भगवान् भुवनभास्कर ने यह अपना दूसरा प्रचण्ड रूप क्यों धारण कर लिया। अभी तो प्रातः की अमृत बेला प्रारम्भ ही हुई थी। सूर्य की अरूण किरणों ने अभी हिमालय के श्वेत हिम शिखरों को छुआ ही था, पक्षियों ने प्रभाती के अपने प्रथम बोल गाए ही थे। इसी बीच यह असामान्य आकाशीय घटना चौंकाने वाली थी। जो चौंके थे, वे यह देखकर और भी चकित हुए कि वह सूर्यसम प्रकाशित प्रचण्ड तेजपुञ्ज उन्हीं की ओर आ रहा था। इस विस्मयकारी घटना से थकित-चकित जनों को सम्बोधित करते हुए तेजस्वी ऋषि विश्वामित्र ने कहा- ‘‘आप सब परेशान होने की जगह उन महान विभूति की अभ्यर्थना के लिए अपने स्थान पर खड़े हों, क्योंकि आज हम सबके बीच स्वयं अगस्त्य ऋषि पधार रहे हैं।’’
    
विश्वामित्र के इन वचनों ने सभी को आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता से पुलकित कर दिया क्योंकि ऋषि अगस्त्य के दर्शन पाना देवों एवं ऋषियों के लिए भी दुर्लभ था। जब से ऋषि अगस्त्य ने पंचभौतिक देह का त्याग कर दिव्य देह धारण की थी, वह सभी के लिए अगम्य हो गए थे। उन्होंने दिव्य देह से अपने लिए एक दिव्य लोक का निर्माण किया था। उनका यह लोक सब प्रकार से अपूर्व एवं अगम्य था। वहाँ विभूति सम्पन्न देवता एवं सिद्धियों से सम्पन्न ऋषि भी अपनी इच्छा से प्रवेश नहीं कर सकते थे। यहाँ स्वाभाविक प्रवेश केवल देवाधिदेव महादेव के लिए ही सम्भव था। भगवान विष्णु एवं परम पिता ब्रह्मा भी अगस्त्य के आह्वान पर ही पधारते थे। अपने इस अपूर्व लोक में ऋषि अगस्त्य अखिल सृष्टि के कल्याणकारी प्रयोगों में संलग्न रहते थे। हाँ! बीच-बीच में वह अपने यहाँ श्रीराम कथा का आयोजन अवश्य करते थे, जिसमें भगवान् भोलेनाथ अवश्य पधारते थे। कभी वे लीलामय प्रभु श्रोता बनते थे, कभी वक्ता।
    
भक्त-भगवान् की इस लीला का रहस्य वे दोनों ही जानते थे। वही समुद्रपान करने वाले ऋषि अगस्त्य के स्वयं पधारने की बात ने सभी को प्रसन्नता से पूरित कर दिया। सब के सब उनकी अभ्यर्थना के लिए खड़े हो गए। इस बीच सूर्यसम तेजस्वी ऋषि अगस्त्य उनके बीच प्रकट हो गए। आते हुए उन्होंने सबसे पहले ब्रह्मर्षि वसिष्ठ एवं ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की ओर देखकर हाथ जोड़े। सप्तऋषियों का अभिवादन किया। इसी के साथ वहाँ उपस्थित सभी देवों एवं ऋषियों ने उन्हें प्रणाम किया। देवर्षि नारद को तो उन्होंने भावों के अतिरेक में छाती से चिपका लिया। वह कहने लगे- ‘‘देवर्षि! आपके इस भक्ति समागम की चर्चा सभी लोकों में व्याप्त हो रही है। भक्ति के इस अपूर्व भावप्रवाह से समस्त लोकों में नवचेतना प्रवाहित करने के लिए आप साधुवाद के पात्र हैं।’’
    
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १०९

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