गुरुवार, 2 सितंबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ५७)

भक्ति वही, जिसमें सारी चाहतें मिट जाएँ
    
ब्रज में जो चैतन्य है,उनमें तो प्रेम चेतना है ही, जिन्होंने जड़ रूप धरा है- पर्वतराज गोवर्धन, भगवती यमुना, वे भी परात्पर प्रेम का साकार स्वरूप हैं। ब्रज में कोई भी अपने लिए कुछ नहीं चाहता- उन्हें शक्ति, सिद्धि, स्वर्ग, मोक्ष कुछ भी नहीं चाहिए। वे तो बस श्रीकृष्ण को अपने सर्वस्व का अर्पण करके प्रसन्न हैं। उनका यह समर्पण इतना प्रगाढ़ है कि वे कृष्ण के लिए कृष्ण का वियोग सहने के लिए भी तत्पर हैं।’’
    
ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की धाराप्रवाह वाणी ने जैसे सबको सम्मोहित कर दिया। सभी स्तब्ध-जड़ीभूत हो गए। देवर्षि तो जैसे भावसमाधि में तिरोहित हो गए। वह यह भी भूल गये कि उन्हें अपने अगले भक्तिसूत्र को उद्घाटित करना है। उन्हें तो ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने स्वयं ही चेताया- ‘‘मेरी अनुभूतियाँ तो उतनी प्रगाढ़ नहीं हैं, देवर्षि तो भक्ति तत्त्व के मर्मज्ञ हैं। उन्हें ब्रजभूमि का व्यापक अनुभव है, अब वह कुछ कहें।’’ विश्वामित्र के इन वचनों से देवर्षि को रोमांच हो आया। उन्होंने कहा- ‘‘ब्रज तो बस ब्रज है। तभी तो स्वयं श्रीकृष्ण ने अपने सखा उद्धव से कहा था- ‘उद्धव मोहि ब्रज बिसरत नाहीं’ उद्धव मुझे ब्रज कभी नहीं भूलता। वहाँ की हवाओं में भी भक्ति घुली है, वहाँ         अपने लिए कोई कुछ नहीं चाहता। मेरा अगला सूत्र भी यही कहता है-
‘नास्त्येव तस्मिंस्तत्सुख सुखित्वम्’॥२४॥
    
उसमें (व्यभिचारी के प्रेम में) प्रियतम के सुख में सुखी होना नहीं है।’’ इस सूत्र के सत्य का उच्चारण करते हुए देवर्षि ने फिर से एक बार ऋषि आपस्तम्ब की ओर देखा। उन्हें अपनी पहली बातों पर संकोच हो रहा था। इस संकोच की धुंधली छाया उनके मुख पर अभी भी बनी हुई थी। उन्होंने संकोच से अपना सिर झुका लिया परन्तु देवर्षि अपने ही भावों में डूबे थे।
    
वे कह रहे थे- ‘‘इस सूत्र के सत्य को ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने स्पष्ट कर दिया है। सच यही है- भक्ति में, प्रेम में, प्रेमी भक्त अपने लिए कुछ भी नहीं चाहता। उसकी कोई भी इच्छा नहीं होती। वह तो बस अपने प्रियतम का सुख चाहता है। उसकी एकमात्र चिन्ता, चाहत, त्वरा, अभिलाषा, अभीप्सा यही होती है कि मेरे आराध्य किस तरह से मुझसे प्रसन्न होंगे। ब्रज की गोपकन्याएँ इसी सबका साकार स्वरूप थीं। उनका सर्वस्व केवल कृष्ण के लिए था। अरे! वही क्यों? वहाँ के ग्वाल-बाल, बाबा नन्द, मैया यशोदा, पर्वतराज गोवर्धन, भगवती कालिन्दी, वहाँ के कदम्ब आदि वृक्ष सभी तो केवल कृष्ण प्रेम के लिए ही थे। भक्ति का सत्य तो ब्रज के धूलिकणों में है।’’ इतना कहकर देवर्षि फिर से भावों में खोने लगे। उन्हीं के साथ अन्य सभी भी भक्तिसरिता में अवगाहन करने लगे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १०३

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