मंगलवार, 17 अगस्त 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ५०)

अद्भुत थी ब्रज गोपिकाओं की भक्ति

विचार वीथियों में खोए हुए न जाने कितनी घड़ियाँ बीत गयीं। ऐसा लग रहा था, जैसे कि सभी की भावचेतना, भावसमाधि में निमग्न हो गयी हो। सबसे पहले ब्रह्मापुत्र ब्रह्मर्षि वशिष्ठ अपनी भावसमाधि की गहनता से उबरे। उनके नेत्रों से भक्ति की उज्ज्वल प्रकाश धाराएँ विकरित हो रही थीं। थोड़ी देर तक यूं ही वह सबको भक्ति भावों में डूबते-तिरते देखते रहे। फिर कहने लगे- ‘‘हम सभी में सबसे अधिक बड़भागी देवर्षि नारद हैं, जो भगवान् की अवतार लीलाओं के सदा साक्षी, साथी और सहचर बनते हैं। उनके जैसा सद्भाग्य और सौभाग्य भला और किसका हो सकता है? गोपियों की आन्तरिक भक्ति को जैसा इन्होंने देखा और समझा है, वैसी अनुभूति कोई अन्य नहीं प्राप्त कर सका है।’’ यह कहकर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ कुछ पलों के लिए रूके फिर सभी की ओर देखते हुए बोले- ‘‘मेरी इच्छा है कि देवर्षि, आप हमें ब्रज गोपिकाओं की भक्ति के और भी प्रसंग सुनाएँ।’’
    
अपनी बात समाप्त करके ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने पहले वहाँ उपस्थित सप्तर्षिमण्डल के सदस्यों की ओर देखा। फिर उन्होंने देवों एवं सिद्धों की ओर अपनी दृष्टि डाली। अन्य ऋषियों की ओर भी उनकी दृष्टि गयी। सभी की आँखों में प्रसन्नता एवं प्रफुल्लता के भाव थे। ऐसा लग रहा था कि सब के सब श्रीकृष्ण भक्ति का आनन्द पाने के लिए उत्सुक हैं। सभी को ब्रज-गोपिकाओं की उत्कट भक्ति ने मोहित कर लिया था। ऐसा पवित्र हृदय, ऐसा असीम अनुराग, ऐसा निष्काम समर्पण, हृदय का ऐसा सम्पूर्ण अर्पण, भला अन्य कहाँ देखा जा सकता है। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने जैसे सभी के मन की बात अपने मुख से कह दी थी। सभी उत्सुक थे- ब्रज की इन भक्तबालाओं का भावचरित सुनने के लिए।
    
ब्रह्मर्षि विश्वामित्र एवं ब्रह्मर्षि पुलह ने भी देवर्षि से यही आग्रह किया। देवर्षि किंचित मुस्कराए, फिर उनके नेत्रों से कुछ एक भाव बिन्दु लुढ़क पड़े। जैसे-तैसे उन्होंने अपनी भावनाओं को उपशम किया। फिर वह कहने लगे- ‘‘ब्रज मुझे कभी भुलाए नहीं भूलता। गोकुल-नन्दगांव-बरसाना-वृन्दावन की वीथियों के रजकणों में भी भक्ति की पावन मधुरता है। आप सबने तो मेरे हृदय की बात कह डाली है। ब्रजगोपियों की कथा, मानवीय लगते हुए भी ईश्वरीय है क्योंकि वे सभी भगवान् श्रीकृष्ण के ईश्वरीय स्वरूप से परिचित व प्रेरित थीं। श्रीकृष्ण उनके लिए ग्वाल-गोप होते हुए प्रियतम-परमेश्वर थे।’’ ऐसा कहते हुए देवर्षि ने अपने अगले सूत्र का मन्त्रोच्चार किया-
    ‘तत्रापि न महात्म्यज्ञानविस्मृत्यपपादः’॥ २२॥
‘इस अवस्था में भी गोपियों में महात्म्यज्ञान की विस्मृति का अपवाद नहीं।’
    
‘‘सर्वेश्वर त्रिभुवनपति- बालरूप में, उनके आंगन में, उनके हृदय में लीला कर रहे हैं- ऐसा वे सभी जानती थीं।’’ देवर्षि नारद ने इतना कहकर सभी की ओर देखा, फिर थोड़ा सा चुप होकर विनम्रता से बोले- ‘‘आज सबको मैं नन्दगांव के एक दिन की कथा सुनाता हूँ। नन्दगांव में सूर्योदय हुआ। गाएँ, ग्वाल, गोप-गोपिकाएँ सभी जागे। माता यशोदा ने स्नान आदि से निवृत्त हो चुके अपने लाडले का शृंगार किया। उनके लाडले कन्हैया को तो अपने सखाओं से मिलने की शीघ्रता थी पर सखा भी तो उनसे मिलने के लिए बावले थे। सो श्रीदामा, मनसुखा आदि सभी सखा उनके द्वार पर जुटने लगे। सभी वृन्दावन जाने की जल्दी में थे।
    
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ९३

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