शुक्रवार, 13 अगस्त 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ४९)

भक्तों के वश में रहते हैं भगवान
    
मैंने एक साथ सभी के उत्साह के अतिरेक की ओर देखा, एक बार प्रभु के श्रीमुख की ओर निहारा और फिर एक पल के लिए मौन होकर के मैं बोला- यदि भगवान श्रीकृष्ण का कोई भक्त अपने चरणों की धूलि को इनके माथे पर लगा दे तो ये अभी और तुरन्त ठीक हो जाएँगे। मेरा यह विचित्र उपाय सुनकर सबके सब पहले तो आश्चर्यचकित हुए फिर सोच में पड़ गए। मैंने अपनी बात आगे बढ़ायी और कहा- महारानी रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवन्ती आदि में से कोई भी इस कार्य को कर सकता है। यह कथन सुनकर वे सब चौंकी और बोली भला यह कैसे सम्भव है। पहले तो ये मेरे पति हैं, फिर ये तो स्वयं परात्पर ब्रह्म हैं। अपने चरणों की धूलि इनके माथे पर लगाकर तो हम सब नरकगामिनी हो जाएँगी।
    
तब ऐसे में यह कार्य इनके बड़े भ्राता बलराम एवं अन्य गुरुजन कर सकते हैं परन्तु नरक का भय शायद सभी को था। कोई भी उन्हें अपनी चरणधूलि देने को तैयार न हुआ। भगवान् श्रीकृष्ण के संकेत से मैं हस्तिनापुर पहुँच गया और मैंने अपना यह सन्देशा- भीष्म, विदुर, कुन्ती, द्रोपदी सहित सभी पाण्डवों को सुनाया। परन्तु स्थिति बदली नहीं, इनमें से कोई भी अपनी चरणधूलि देने के लिए तैयार न हुआ। सभी को भय था- नरक जाने का। सभी भयभीत थे पापकर्म से। उन्हें अनेक तरह की शंकाएँ थीं, जो उनको ऐसा करने से रोक रही थीं।
    
अन्त में प्रभु प्रेरणावश मैं ब्रजभूमि पहुँचा और वहाँ भी मैंने अपने स्वामी की बात कही। मेरी बात सुनते ही- सब के सब अपनी चरणधूलि देने के लिए उतावले हो गए। सभी गोपिकाएँ तो बिना कहे ही पोटली में अपनी चरणधूलि लेकर आ गयीं। उनके ऐसा करने पर मैंने उन्हें समझाया कि अभी भी समय है तुम सब सोच लो, श्रीकृष्ण भगवान् हैं, उन्हें चरणधूलि देकर तुम सब नरक में जाओगे। मेरे इस कथन के उत्तर में एक जोरदार ठहाका गूँजा, और ब्रजगोपिकाओं के स्वर उभरे, अपने कृष्ण के लिए हम सदा-सदा के लिए नरक भोगने के लिए तैयार हैं। मैं निरुत्तर होकर वहाँ से चलकर द्वारका पहुँच गया। और अपनी अनुभव कथा वहाँ कह सुनायी। सब कुछ सुनकर श्रीकृष्ण हँसे और बोले- नारद यही है वह भक्ति, ये ही हैं वे भक्त, जिनके वश में मैं हमेशा-हमेशा रहता हूँ। प्रभु के इस कथन पर सर्वत्र मौन छा गया। सबके सब सोच में डूब गए।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ९१

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