सोमवार, 12 अप्रैल 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग २)

👉 देवर्षि नारद का आह्वान

हिमालय अपने अन्तस् की समूची दिव्यता का वैभव बिखेरने के लिए आज संकल्पित था। जिस पवित्रता, शान्ति एवं सघन आध्यात्मिकता के लिए उसे जाना जाता है। इन क्षणों में वह सब कुछ यहाँ साकार हो रहा था। हिमाच्छादित उत्तुंग शुभ्र धवल शिखर आज वसुधा पर स्वर्गीय भावनाओं के शुभ संदेश के अवतरण का माध्यम बन रहे थे। निरभ्र आकाश के विस्तार में चन्द्रदेव अपनी सम्पूर्ण प्रभा के साथ उदित हो चुके थे। उनकी अमृतवर्षिणी चान्दनी हिमालय के इस दिव्य परिसर की दिव्यता को और भी शतगुणित कर रही थी। चारों ओर हिमशिखरों से घिरी यह घाटी सब भाँति न केवल अद्भुत, बल्कि अगोचर थी।

यहाँ तक पहुँच पाना उनके लिए भी असम्भव है जो पर्वतीय यात्राओं एवं पर्वतारोहण के लिए विशेषज्ञ माने जाते हैं। अपनी दुष्कर पर्वतीय यात्राओं एवं महाकठिन पर्वतारोहण से हिमालय के जिस परिचय का लोग बखान करते हैं; वह तो बस उसके विशाल-व्यापक कलेवर का परिचय है लेकिन काया का परिचय आत्मा का परिचय नहीं है। हिमालय की आत्मा का परिचय तो उन्हें ही मिलता है, जिस पर देवों एवं ऋषियों की कृपा होती है।
    
हिमालय में जलधाराओं के अनेको स्रोत हैं। गंगा, यमुना जैसी महानदियों की पावनता भी इन्हीं पर्वतराज की गोद में खेलकर पल्लवित होती है लेकिन इन सभी जलधाराओं के अतिरिक्त एक अन्य महाधारा का स्रोत हिमालय है। यह महाधारा तप की है, जिसका पावन उद्गम हिमालय की आत्मा है। जिसके सम्मोहक सौन्दर्य के सामने यहाँ का समस्त प्राकृतिक सौन्दर्य फीका है। इस रहस्य को यहाँ निवास करने वाली महाविभूतियों की कृपा के बिना समझा नहीं जा सकता है। इस अतुलनीय सौन्दर्य की एक झलक भी जिन्होंने अपने स्वप्न अथवा समाधि में पायी है, वे इन पंक्तियों के मर्म का स्पर्श सम्भवतः कर सकते हैं। इस शुभ घड़ी में हिमालय का वही अतुलनीय सौन्दर्य साकार हो रहा था। देवों एवं ऋषियों के मिलन के इस दिव्य केन्द्र में आज अलौकिक जागृति थी।
    
युगों-युगों से महातप में संलग्न दिव्य आत्माएँ एकत्र हो रही थीं। दिव्य देहधारी कतिपय विशिष्ट देवगण यहाँ आये हुए थे। महः जनः तपः लोकों के प्रतिनिधि महर्षियों की दिव्यता भी यहाँ आलोकित थी। धरती के महान तपस्वियों का भी हिमालय की आत्मा ने आह्वान किया था, सो वे भी उपस्थित थे। जिनकी गाथाएँ वेदों, पुराणों एवं संसार के विभिन्न धर्मगं्रथों में कही-सुनी जाती हैं, उन सभी का सारभूत तत्त्व यहाँ सघन हो रहा था। हिमालय की शुभ्रता एवं चन्द्रदेव की चाँदनी की धवलता, इन सबके तप की महाप्रभा से मिलकर समूचे वातावरण को ज्योतित कर रही थी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ९

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