सोमवार, 12 अप्रैल 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २)

👉 प्रत्यक्ष लगने पर भी सत्य कहां

आंखों का काम मुख्यतया प्रकाश के आधार पर वस्तुओं का स्वरूप समझना है। पर देखा जाता है कि उनकी आधी से ज्यादा जानकारी अवास्तविक होती है। कुछ उदाहरण देखिए। कारखानों की चिमनियों से धुओं निकलता रहता है। गौर करके उसका रंग देखिए वह अन्तर कई तरह का दिखाई देता रहता है। जब चिमनी की जड़ में पेड़, मकान आदि अप्रकाशित वस्तुएं हों तो धुआं काला दिखाई देगा पर यदि नीचे सूर्य का प्रकाश चमक रहा होगा तो वही धुआं भूरे रंग का दीखने लगेगा। लकड़ी, कोयला अथवा तेल जलने पर प्रकाश के प्रभाव से यह धुआं पीलापन लिये हुए दीखता है। वस्तुतः धुंए का कोई रंग नहीं होता। वह कार्बन की सूक्ष्म कणिकाओं अथवा तारकोल सदृश्य द्रव पदार्थों की बूंदों से बना होता है। इन से टकरा कर प्रकाश लौट जाता है और वे अंधेरी काले रंग की प्रतीत होती हैं।

रेल के इंजन में वायलर की निकास नली से निकलने वाली भाप निकलते समय तो नीली होती है पर थोड़ा ऊपर उठते ही संघतित हो जाने पर भाप के कणों का आकार बढ़ जाता है और वह श्वेत दिखाई देने लगती है।

जिन फैक्ट्रियों में घटिया कोयला जलता है उनका धुआं गहरा काला होता है और यदि उसमें से आर पार सूर्य को देखा जाय तो सूर्य गहरे लाल रंग का दिखाई देगा।


पानी के भीतर अगणित जीव-जन्तु विद्यमान रहते हैं पर खुली आंखों से उन्हें देख सकना संभव नहीं, माइक्रोस्कोप की सहायता से ही उन्हें देखा जा सकता है। आकाश में जितने तारे खुली आंखों से दिखाई पड़ते हैं उतने ही नहीं हैं। देखने की क्षमता से आगे भी अगणित तारे हैं जो विद्यमान रहते हुए भी आंखों के लिए अदृश्य ही हैं बढ़िया दूरबीनों से उन्हें देखा जाय तो दृश्य तारागणों की अपेक्षा लगभग दस गुने अदृश्य तारे दृष्टिगोचर होंगे।

परमाणु अणु की सत्ता को दूर सूक्ष्म दर्शक यन्त्रों से भी उसके यथार्थ रूप में देख सकना अभी भी सम्भव नहीं है। उसके अधिक स्थूल कलेवर की गणित के अध्यात्म पर विवेचना करके परमाणु और उसके अंग प्रत्यंगों का स्वरूप निर्धारण किया गया है। अणु संरचना के स्पष्टीकरण में जितनी सहायता उपकरणों ने की है उससे कहीं अधिक निष्कर्ष अनुमान पर निर्धारित गणित परक आधार पर निकाला जाना सम्भव हुआ है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ४

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