गुरुवार, 15 अक्तूबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ५१)

तीव्र प्रयासों से मिलेगी, समाधि में सफलता

समाधि की अवस्था को पाने के लिए पूर्व वर्णित तत्वों एवं सत्यों का जीवन में तीव्रतर होते जाना जरूरी है। सारा सुफल इस तीव्रता का ही है। महर्षि कहते हैं-
तीव्रसंवेगानामासन्नः॥ १/२१॥
शब्दार्थ- तीव्रसंवेगानाम् = जिनके साधन की गति तीव्र है, उनकी (समाधि); आसन्नः = शीघ्र (सिद्ध) होती है।
अर्थात् समाधि की सफलता उनके निकटतम होती है, जिनके प्रयास तीव्र, प्रगाढ़ और सच्चे होते हैं।
    
महर्षि के इस सूत्र में अनगिनत योग साधकों की सभी शंकाओं, समस्याओं, संदेहों एवं जिज्ञासाओं का समाधान है। इन पंक्तियों को पढ़ने वाले साधकों के मन में कभी न कभी यह बात अंकुरित हो जाती है कि इतने दिन हो गये साधना करते, बरस बीत गये गायत्री जपते, अथवा साल गुजर गये ध्यान करते, पर कोई परिणाम नहीं प्रकट हुआ। वह बात नहीं पैदा हुई जो सारे अस्तित्व को झकझोर कर कहें कि देखो यह है साधना का चमत्कार और जब ऐसा नहीं होता है, तो कई परमात्मा पर ही शक करने लगते हैं। मजे की बात यह है कि उन्हें अपने पर शक नहीं होता-मेरी साधना में कहीं कोई भूल तो नहीं? नाव ठीक नहीं चलती, तो मेरी पतवारें गलत तो नहीं है? दूसरा किनारा है या नहीं, इस पर संदेह होने लगता है। 
    
मगर ध्यान रहे, जिस नदी का एक किनारा है, दूसरा दिखाई पड़े या न पड़े, होगा ही, बल्कि है ही। कोई नदी एक किनारे की नहीं होती। उस दूसरे किनारे का नाम समाधि है, इस किनारे का नाम संसार है। संसार और समाधि के किनारों के बीच जीवन की यह अन्तःसलिला, यह गंगा बह रही है। अगर ठीक से नाव चलाई जाय, सही ढंग से साधना की जाय, तो समाधि निश्चित है।
    
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ९०
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

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