बुधवार, 16 सितंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग २७)

कल्पना में भी है अक्षय ऊर्जा का भंडार

काव्य कला सहित विश्व-वसुधा की समस्त कलाएँ प्रायः इसी रीति से जन्मी, पनपी एवं विकसित हुई हैं। विश्व को चमत्कृत कर देने वाली शोध सृष्टि भी कल्पनाओं के तर्कपूर्ण विवेकयुक्त विचार से सम्बद्ध होने से हुई है। अन्तः भावनाओं एवं तर्कपूर्ण विचार से कल्पना के जुड़ने से इन दोनों के अलावा एक अन्य सुखद परिणति भी होती है और वह परिणति है- जीवन जीने की कला का विकास। जीवन में एक अपूर्व कलात्मकता,लयबद्धता का  सुखद् जन्म। इस सत्य से प्रायः बहुत कम लोग परिचित हो पाते हैं, लेकिन जो परिचित हो जाते हैं-उनका जीवन सुमधुर काव्य की भाँति सुरीला, संगीत की तरह लययुक्त एवं नवीन शोध की भाँति आश्चर्यजनक उपलब्धियों का भण्डार हो जाता है।

उचित कल्पना का संस्पर्श पाकर जीवन बड़े ही आश्चर्य रीति से बदल जाता है। यह बदलाव ऐसा होता है, जैसे कि पारस लोहे के काले-कलूटे टुकड़े का छूकर सुगन्धित स्वर्ण बना दिया हो। कहानी एमिली जेन की है, जो पहले अपने बचपन में कूड़ा-करकट बीनती थी और बाद में विश्व विख्यात अभिनेत्री बन गयी। उसकी जीवन कथा-‘वन्डर ऑप वर्ड्स’ के लेखक जेम्स एलविन का कहना है कि एमिली जब छोटी थी एक दिन वह कूड़ा-करकट से कुछ बीन रही थी। बीनती-बीनती वह थक गयी। साथ कुछ लड़के-लड़कियाँ और भी थे। मनोरंजन के लिए सब मिलकर नाचने लगे। तभी वहाँ से अनविन रोजर्ट का गुजरना हुआ।
  
रोजर्ट ने बच्चों के बीच नृत्य करती हुई एमिली को देखा। उसे संकेत से पास बुलाया और धीरे से कहा—प्यारी बच्ची! तुम अद्वितीय हो, सौंदर्य और कला का अपूर्व मिश्रण तुममें है। तुम चाहो तो क्या नहीं कर सकती? सचमुच ही मैं कुछ भी कर सकती हूँ? एमिली ने पूछा। हाँ, तुम कुछ भी कर सकती हो। इस एक कल्पना ने अन्तः भावनाओं एवं तर्कपूर्ण, विवेक-युक्त विचारों से मिलकर एमिली को नया जन्म दिया, वह एमिली जो कला की देवी मानी जाने लगी। तभी तो परम पूज्य गुरुदेव कहते थे-कल्पना को ख्याली पुलाव मत बनाओ। उसे अपनी शक्ति समझो। अपना ऊर्जा स्रोत बनाओ।
  
कल्पनाओं को यूँ भटकने देना, यूँ ही बहकने देना और उस बहाव में स्वयं भी भटकने व बहने लगना न केवल कल्पना शक्ति की बर्बादी है, बल्कि इससे जीवन भी बर्बाद होता है। ऐसे में विकल्प की यह वृत्ति क्लेश उत्पादक बन जाती है। लेकिन इसका सदुपयोग होने से यह क्लेश निवारक बन जाती है। बस, सब कुछ हम साधकों पर है कि उसे अपनी साधना का साधक तत्त्व बनाते हैं या फिर उसे बाधक बने रहने देते हैं। हमारी योग साधना के खरे होने की कसौटी इसे अपनी साधना का साधक तत्त्व बनाने में है। इस विकल्प वृत्ति की साधना यदि बहिर्मुखी हो तो हमें सांसारिक उपलब्धियों के वरदान देती है और यदि इसे अन्तर्मुखी करलें, कल्पना हमारी धारणा का स्वरूप ले ले, तो हमें यौगिक विभूतियों के वरदान देती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ५०
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

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